रविवार, 18 अक्तूबर 2020

कहानी, एक पुरानी

 नमस्कार महोदय

नमस्कार, जी आप... कौन? पहचाना नहीं मैंने। 

जी मैं एक दूत हूँ। नदी के तट पर जो धर्मशाला है वहां से आया हूँ। 

इतनी दूर से? जी कहिये। 

जी गौतम से काम था. वो घर में हैं क्या ?

गौतम? जी नहीं वो तो अभी नहीं हैं। 

ये कहते हुए गौतम के चेहरे पर चिंता सी उभर आयी थी। 

जी अच्छा... जी, तो कब तक आ जायेंगे वो ? 

मैं क्या कह सकता हूँ ? वो अपनी इच्छा के अनुसार आते जाते हैं। किसी को कुछ नहीं कहते। हो सकता है अभी प्रगट हो जाएँ। या तीन दिन तक के बाद भी दृषिगोचर न हों। पर आप आने का प्रयोजन तो बता ही सकते हैं।  मैं गौतम से कह दूंगा। 

वैसे तो मुझे कठोर निर्देश है की इस विषय पर किसी से कोई चर्चा न करूँ , परन्तु क्योंकि आप कदाचित गौतम के साथ रहते हैं मैं आपको ये सन्देश दे देता हूँ। 

जी कृपा होगी।  गौतम को भी इस सन्देश पर कोई कार्य करना हो तो समय व्यर्थ नहीं होगा। 

जी उनसे कहिये कि देवांगना जिवानी नगर की धर्मशाला में कुछ दिनों के लिए आयी हैं।  यदि सम्भव हो तो श्री गौतम से मिलने की इच्छा रखती हैं। 

देवांगना जिवानी स्वयं ! आप तनिक विराजें मैं कुछ फल काट कर अभी प्रस्तुत करूंगा। 

जी नहीं।  आप कष्ट न लें। 

कदापि नहीं इसमें कष्ट किसी प्रकार का कष्ट नहीं है। आप इतनी दूर से (बाहर झांकते हुए और कोई अश्व न देख कर) पैदल ही आये हैं। केवल पांच क्षण लगेंगे (एक हलकी सी मुस्कान के साथ) 

अंदर के कक्ष में पांच क्षणों में गौतम के चेहरे पर कई भाव आये और गए। क्या अपनी पहचान छुपा कर गौतम ने बिना कारण एक असत्य अपने ऊपर ओढ़ लिया। 

असत्य ... कई वर्ष पहले एक असत्य ने ही उसकी राह में कितने कांटे बो दिए थे। विवाह के समय ही वो जिवानी को मिला था और एक छोटी सी अवधि में ही वो दोनों प्रेम के अथाह सागर में डूब गए थे। उधर उसके पिता माता उससे परामर्श किये बिना राज्य के एक धनाढ्य व्यापारी की सुपुत्री को अपनी बहू बनाने का वचन दे चुके थे। गौतम को जब से भान है उसने कभी भी अपने माता पिता के हर वचन का पालन किया था। कदापि इच्छा न रहते हुए अस्त्र शस्त्र का ज्ञान अर्जित किया, अश्वारोहण में निपुण हो गया, वो युद्ध की जटिलता एवं गूढ़ता का भी विशेषज्ञ बन गया था। पर इस विवाह को सिर झुका कर स्वीकार करना उसके लिए अत्यंत कठोर चुनौती बन गया था। 

पीतल की थाली में कटे हुए सेब तथा छीले हुए संतरे ले कर गौतम बाहर आया।  क्षमा करें कदाचित तनिक विलम्ब हो गया। आप ग्रहण करें मैं जल ले कर अभी उपस्थित हुआ। 

अब आप तो मुझे लज्जित कर रहे हैं। 

कदापि नहीं। आप ग्रहण करें। 

जी। 

आपसे एक क्षमा याचना करनी है। 

जी ! ऐसा क्या घट गया ?

देव मैंने किसी पर्याप्त कारण के आपसे एक असत्य कह दिया। 

असत्य ? कैसा असत्य ?

जी गौतम के विषय में। 

ओहो तो क्या गौतम यहाँ नहीं विराजते ? मेरा अत्यंत मूल्यवान समय व्यर्थ हो गया। 

नहीं नहीं ऐसा कदापि नहीं है।  जी वास्तव में गौतम आपके समक्ष उपस्थित है। 

जी?

जी क्षमा करें सेवक ही गौतम है। 

परन्तु आपने ऐसा किस कारणवश ..?

चलिए इसका भेद मैं राह में खोलूँगा, राह भी कट जाएगी 

दोनों द्धार के बाहर निकले।  गौतम ने किसीको रक्षक के नाम से बुलाया। एक  श्वान उठ कर आया। गौतम ने कहा 'तनिक ध्यान रखो हम संध्या काल तक आएंगे। ये लो कुछ फल हैं।  मित्रों के साथ मिल बाँट के ग्रहण करना।' श्वान खुले हुए द्वार के समक्ष बैठ गया। 

राह में कुछ क्षणों पश्चात् गौतम ने आगंतुक से अपने परिचय का अनुरोध किया। 

आनंद।  पिताजी ने नामकरण किया था, आनंद आदित्य।  

ये तो अत्यंत दुर्लभ नाम है। एक ओर आनंद तथा उसके समकक्ष सूर्य। इस नाम की कोई तुलना नहीं हो सकती। 

आनंद के मुख पर एक नन्ही सी मुस्कान बिखर गयी, अपने नाम पर परन्तु उससे अधिक अपने पिता की प्रशंसा से।

मेरे पिता शास्त्रों के पंडित थे तथा लेखक भी थे। इसी वर्ष माघ के माह में उन्होंने मोक्ष ले लिया। 

मुझे खेद है आनंद। 

नहीं कोई बात नहीं। अंतिम समय में उनके चेहरे पर अत्यंत संतोष एवं स्नेह था। 

इस प्रकार का प्रयाण तो ऋषियों को ही प्राप्त हो सकता है।   

आप अत्यंत उदार हृदय हैं। 

तो कहिये देवी जिवानी का मुझसे क्या प्रयोजन हो सकता है। 

इस प्रश्न का उत्तर तो मेरे लिए दुष्कर है। परन्तु उनके विषय में यदि मैं कुछ कहूँ तो कदाचित कोई अर्थ निकले।  

आवश्य कहो।  क्षमा, कहिये। 

जी निन्दित न करें।  मैं आपसे आयु तथा ज्ञान में बहुत पीछे हूँ। आप मुझे त्वम् या तुम कह सकते हैं। 

गौतम ने आनंद के कंधे पर हथेली रखते हुए कहा "

मैं देवी के सान्निध्य में वर्षों से रहा हूँ। वे सदैव अति हंसमुख स्वाभाव की महिला रही हैं। परन्तु विगत चंद माह से वो किसी विचार में लुप्त रहने लगी हैं। मैंने एक बार जानने का प्रयत्न किया था, परन्तु इसका रहस्य वो मुझे कदापि नहीं कहेंगी।  मैं उनके इतना घनिष्ठ नहीं हूँ।  

हम्म ... तो तुम इस निष्कर्ष पर कैसे पहुँच गए कि वो इस रहस्य का मेरे समक्ष अनावरण कर देंगी?

आपका ये प्रश्न उचित है परन्तु इसका उत्तर इतना सरल नहीं है। मुझे चारों ओर परिक्रमा करके आपको अनेकों कहानियां सुनानी पड़ेंगी। 

मैं सुनने के लिए तत्पर हूँ। 

आदरणीय गौतम मेरा विचार है हम कुछ समय इस झरने के समीप उस समतल सी शिला पर विराज लें। तनिक विश्राम के साथ जल ग्रहण करें हस्त एवं मुख प्रक्षालन भी। परन्तु मुझे देवी की समस्या का वर्णन करने में भी समय लगेगा। यहाँ से वो धर्मशाला केवल अर्ध कोस पर ही है। 

मैं तुम्हारी योजना की प्रशंसा किये बिना नहीं रह सकता। तो कहो।

(शेष फिर कभी)

शनिवार, 17 अक्तूबर 2020

न कारवां है न ग़ुबार है

मैं भी अपने उन दिनों में
जुड़ा था एक कारवाँ से 
मेरे लिए वो पहला ही कारवाँ था 
मैं जुड़ा था जिससे
जब मैंने उसे नज़दीक से देखा
मैं देखता ही रह गया था 
वो इतना बड़ा, ऊंचा और सुंदर था
सुना वो कई मंज़िलें तय कर चुका था 
मुझे तो लगा था
कि मेरे जैसे आम आदमी को ये कैसे देखेगा  
कैसे देख सकेगा 
इतने ऊंचे कारवाँ को 
मैं दिखाई भी दूंगा या नहीं ...

मैं घर आ गया 
अगले दिन फिर गया 
उस कारवां के इर्द गिर्द घूमा 
एकाएक ऐसा लगा
कि शायद मैं इसको
बचपन से जनता हूँ 
पहचानता हूँ 
आज कारवां की खुशबू भी अच्छी थी
कहीं कहीं से संगीत सुनाई दे रहा था 
कहीं कोई गा रहा था 
हर कोई किसी न किसी काम में मस्त था 
ख़ुश था 
खिड़की से किसी ने हाथ हिलाया 
फिर अंदर बुलाया 
पानी पिलाया चाय भी पिलाई 
अब मुझे वो सब सीधे साधे ही लगे 
काफी कुछ मेरे जैसे 
एक ने कहा कहाँ रहते हो 
मैंने कुछ कहा 
उसने कहा तो यहीं रह जाओ 
मैं मुस्कराया और सोचने लगा  
अरे हम लोग हमेशा एक नयी मंज़िल की तरफ चलते हैं
नए शहरों नए घरों में रहते हैं 
नए नए घर बनाते हैं  
अपने नए गीत बनाते और गाते हैं 
ये बात मुझे बेहद पसंद आयी 
तुम भी हमारे साथ कई मंज़िलें देख सकते हो  
मेरे भी वो दिन थे 
वो वाले, जब जोश होता है 
हिम्मत होती है 
और ऐसे कारवाँ 
दुनिया में कम ही होते हैं 
मैं अपनी पोटली ले कर पहुँच गया ...
 
फिर मुझे याद नहीं
कितनी मंज़िलें हमने पार कीं 
कहीं रुके या 
बिना रुके ही बढ़ते गए 
बढ़ते गए ...

ख़ैर जनाब वक़्त बदलता है 
चीज़ें बदलती हैं 
सुंदरता कम हो जाती है 
चाल धीमी हो जाती है 
नयी मंज़िलों को ख़्वाहिश भी कम हो जाती है 
कारवां भी रुक रुक के चलता है 
कई लोग दूसरे कारवां ढूंढने लगे थे  
अब मैं भी उसे कुछ दूर से देखा रहा था 
उसकी शक्ल अलग सी हो गयी थी 
वो भी मुझे पहचानने की कोशिश कर रहे थे 
मेरे भाव पढ़ रहे थे

मुझे याद है जब ये कारवां चलता था 
तो कितना ढेर सारा ग़ुबार उठता था 
और कितना ऊंचा जाता था 
उस ग़ुबार का भी एक नशा था 

कहते हैं, "मैं अकेला ही चला था 
जानिबे मंज़िल मगर 
लोग साथ आते गए कारवां बनता गया"...

अब मैंने इस ख्याल का उल्टा प्लैबैक होता देखा है 
'दोस्त' साथ छोड़ते गए 
कारवां गुम होता गया
अब न तो वो कारवां है 
न ही वो ग़ुबार ...

गुरुवार, 15 अक्तूबर 2020

लेखक - पागलपन

"ठीक है।  मैं जा रहा हूँ नहाने। अब तब तक मुंह नहीं दिखाऊंगा जब तक पूरी तरह साफ़ सुथरा ना बन जाऊं। कसम खा ली है। भूल चूक माफ़। समझ लो अब तो दीवाना निकल पड़ा है कमर में तौलिया बाँध कर। मुझे रोकने के बारे में तो सोचना भी मत। पीछे मुड़ने का कोई रास्ता नहीं है। मैंने पूरी सफाई करने की ठान ली है। खुद की सफाई को हम हरगिज़ भुला सकते नहीं, ठन्डे पानी से नहा सकते हैं लेकिन वापस आ सकते नहीं। "

***

वो तौलिया बांधे वापस लौटा।

"मैं आ गया।  कहाँ हो भई ?" वो आई और मुझे अजीब नज़रों से देखा। 

"कौन हैं आप "

"अरे मैं ! याद नहीं ये तौलिया ? इसी में तो मैं गया था। "

"माफ़ कीजिये शायद आपसे भूल हुई है।  वो तो इतने साफ़ कभी नहीं दिखते। आप पड़ोसी की घंटी बजा कर पूछ लीजिये अगर वो आपको पहचानते हैं।"

"क्या ग़ज़ब कर रही हो मैं उनसे क्यों पूछूं ? अरे रुको।  ये मैं ही हूँ। ये देखो कंधे पर ये निशान।"


"अरे ऐसे निशान तो कितनो के देखे मैंने।"

"क्या कहा? कितनो के !"

"हाँ वही तो कहा मैंने "

"अच्छा सुनो सुनो, तुम्हें याद है जब हमने एक फिल्म देखने का प्लान बनाया था पर जा नहीं पाए। याद आया? और फिर पिछले महीने हम महाबलेश्वर जाने वाले थे पर टिकट नहीं मिले। ये सारी प्यार भरी बातें तुम्हें बिलकुल याद नहीं ?"

"क्या तुम उस मराठी कॉमेडी फिल्म की बात कर रहे हो जो हम देख नहीं पाए ?"

"हाँ हाँ वोही। वही हूँ मैं। क्या यार तुमने तो टेंशन में डाल दिया था। अरे ठीक है अब रोओ मत। ग़लती इंसान से ही होती है।  जो हुआ सो हुआ।  देखो न कितने आंसू बहा दिये। आओ इस तौलिये से पोंछ दूँ। "

"क्या!! नहीं नहीं रहने दो , मैं टिशू ले लूंगी।"

लेखक

"साब आज इधर वाली टेबल ले लीजिये"

"ठीक है, कोई आने वाला है क्या ?"

"अरे वही मालिक के रिश्तेदार... फिर से"

"कोई बात नहीं, ज़रा वो ऐश ट्रे दे देना  

पानी थोड़ा दूर ही रखो 

कहीं हाथ लग गया तो इस कंप्यूटर की मौत समझो

और इसकी मौत से पता नहीं कितनी ज़िंदगियाँ उलझी हुई हैं

नहीं कुछ पूछना मत

मतलब चाय कॉफी के लिए

मैं ही बुला लूँगा

ये पंखा कितनी आवाज़ करने लगा है ना आजकल

इसमें थोड़ा तेल डालने की ज़रुरत है

देखो न कितनी खचर खचर कर रहा है

अब ऐसे में रोमांटिक मूड बने तो कैसे बने

कल हीरो ने लड़की को पिक्चर के लिए राज़ी कर लिया था

इतने इस पंखे के शोर में तो दोनों को मोटर बोट में भेजना पड़ेगा

खचर खचर खचर खचर

चलो यार चाय ही ले आओ

और सुनो... वो समोसे, कबके ताज़े हैं

अगर परसों तक के हैं तो एक ले आओ

दो हरी मिर्चों के साथ 

और अपना वो पीले रंग का टोमेटो सॉस मत भूलना

चाय मक्खी के बग़ैर हो तो बेहतर होगा

अरे सुनो सुनो... इतनी जल्दी भी क्या है

जब तक चाय ठंडी होती है न्यूज़ पेपर दे जाओ

... भई वाह आज तो चाय खासी गरम है

ये लो एक बेहद ज़रूरी बात तो हम भूल ही गए

बाहर हमारी साइकिल खड़ी है

उसपे नज़र मारते रहना"

हाँ अब मन को शांति मिली

कोने पे हीरो हेरोइन एक कटिंग चाय आपस में शेयर कर रहे हैं

अब 'दोस्त' इतने झंझट में रोमांटिक सीन 

इससे ज़्यादा रोमांटिक नहीं हो सकता

क्या ख़याल है आपका

ये दुनिया जो हम देखते हैं 

लोगों को आते जाते 

खाते पीते झगड़ते बतियाते 

कुत्ते बिल्लियां चूहे छछूंदर 

गौरैय्या बुलबुल कौवे कबूतर 

आसमान में उड़ते चील, बाज़

उड़ती पतंग हवाई जहाज़  

समंदर तालाब नदी नाले 

लिखने वाला पढ़ने वाले ...

किसीने कहा ये सब मिथ्या है 

है कुछ नहीं, बस हमने सोच लिया है 

अगर मेरी कल्पना में नाव कभी आयी नहीं   

तो आंखें उसे देख न पाएंगी कभी...

तुम मेरे सामने हो या मेरे ख़याल में हो

या मेरे ख़यालों की वजह से सामने हो 

मैं भी शायद एक ख़याल हूँ

पर मैं जैसा हूँ वो अपने ख़याल से हूँ...

क्या तुमने मुझे जैसा सोचा, वैसा मैं हूँ?

मैं तो अपने ख़याल बदल के तुमको बदल सकता हूँ 

ग़नीमत है 'दोस्त' ये दुनिया, ख़याली दुनिया है 

हर एक का अपना ख़याल है, अपनी दुनिया है

रविवार, 1 सितंबर 2019

दर्द सुकून का

पहले हर दर्द से डर लगता था 
अब लगता है ग़लत लगता था
 
अब तो दास्तान ए दर्द के दीवान पढ़े जाते हैं 
तब बड़ी मुश्किल से एक पन्ना पलटता था 

बहुत कुछ मिला उससे, मेरी ख़ुशनसीबी 
वो ख़ुद मिलता तो और अच्छा लगता था 

पर्त दर पर्त मैंने ख़ुद में ढूँढा उसको 
किसी पर्त में तो मिल जायेगा ऐसा लगता था 

एहमियत ख़त्म हो गयी हर सुकून हर दर्द की
पहले हर नफ़े नुक़सान का हिसाब रखता था 

मिट गयीं सरहदें सुकून और दर्द की 'दोस्त' 
पहले तो सुकून में भला, दर्द में बुरा लगता था

शनिवार, 16 मार्च 2019

पता नहीं क्यों

दूर वो जो पर्दा दिखाई देता है 
उस के पीछे कोई बैठा लगता है 
कभी कभी वो परदे पर एक अक्स छोड़ देता है 
पर कभी दिखाई नहीं देता 
मैंने तो उसे कभी देखा नहीं 
नहीं, असल में किसी ने भी नहीं 
कौन होगा वो 
और वहां क्यों छुपा बैठा है 
क्या उसे दुनिया की ज़रुरत नहीं है 
या शायद वो दुनिया से छुप रहा है 

आज मैंने दूर से देखा 
कुछ दूर पर लोगों का एक झुण्ड था 
वो सब उस परदे की ओर देख रहे थे 
ज़ोर ज़ोर से बातें कर रहे थे 
हाथ हिला-हिला कर इशारे कर रहे थे 
ऐसा लगा कि आज तो इस पर्दे का
पर्दा फाश करके रहेंगे
मैं उनके नज़दीक गया 
उन सबकी मिलीजुली आवाज़ों से कुछ समझ न आया 
फिर मैंने एक के कंधे पर हाथ रखा 
कोई फायदा नहीं हुआ 
दूसरे का हाथ पकड़ के उसे टोका  
तो वो दूसरा हाथ हिलाने लगा 
फिर मैंने उसे अपनी ओर खींचा
उसने बेहद अजीब नज़रों से मुझे देखा 
"क्या चाहिए", बोला
मैंने कहा, "ऐसा भी क्या हो गया 
इस परदे का किस्सा तो पुराना है"
"अजी जनाब आपको पता नहीं, 
उस परदे के पीछे एक नहीं दो लोग हैं" 
ज़हन में एक बिजली सी चमकी 
दो लोग!
कैसे? किसने देखा ?
सबने देखा 
पहले एक का सर ऊपर आया 
फिर छुप गया 
फिर दूसरे का 
और वो भी नीचे बैठ गया 
दो लोग!
कोई बोला "मुझे पता है दूसरा सर औरत का है
दोनों एक साथ ऊपर नहीं आते"
जैसे वो साथ दिखाई नहीं देना चाहते 
किसी को नहीं, कभी नहीं


कहानी, एक पुरानी

 नमस्कार महोदय नमस्कार, जी आप... कौन? पहचाना नहीं मैंने।  जी मैं एक दूत हूँ। नदी के तट पर जो धर्मशाला है वहां से आया हूँ।  इतनी दूर से? जी क...