शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

... याद नहीं

यादों के नासूर थे, या ज़ख्म--जुदाई, याद  नहीं,
बस एक हल्का सा दर्द रह गया है, वजह याद नहीं

जब हम साथ थे, तो थी सारे जहाँ से दोस्ती,
तुम्हारे बाद कितनी निगाहें फिर गयीं, याद नहीं 

निगाहें तो मिल ही जाती हैं अब भी, किसी न किसी से
पर किसी नज़र ने मुझसे कुछ कहा हो, याद नहीं

कहना, सुनना, कुछ  कहना या अनसुना करना
लफ्ज़ सिर्फ आवाजें रह गए हैं, मायने याद नहीं

अब भी करते हैं मुझसे बहुत सी बातें, बहुत से लोग,
दिल तक किसीकी बात पहुंची हो, याद नहीं

मैं डूबा रहा तुम्हारी बातों में, निगाहों में 'दोस्त'
कितनी गहराई थी अपनी दोस्ती में, ये भी याद नहीं 

एक अस्तित्वहीन बिंदु...

एक  बिंदु  था मैं 
केवल  एक  बिंदु 
  कोई  चेहरा,   शरीर 
 दिल   दिमाग 
 पहचान,  नाम 
पर  वो  मैं  था 
पूरी तरह से मैं  ही  था 
आवश्यकता  ही  नहीं  थी  किसी और चीज़  की 
मैं  अपने  उस एक-बिंदु-पन  में  खुश था
सम्पूर्ण  था... 

अब  मुझ  जैसे  करोड़ों  बिंदु  मुझ  में  हैं 
मेरी  देह  में 
मेरे मस्तिष्क में 
ये  सारे बिंदु  संसार  के अनगिनत  बिन्दुओं  से  मिलते  हैं 
उलझते हैं 
झगड़ते हैं 
रोते हैं हँसते  हैं 
प्रेम  और  नफरतें  भी  करते  हैं 
कभी  दुनिया मेरे बिन्दुओं को  हुकुम देती है 
कभी  ये  बिंदु  दुनिया  को  चलाना  चाहते  हैं 
दुनिया  पर राज करना चाहते  हैं

पर  ये  करोड़ों  बिंदु  उस  एक  बिंदु  की  पवित्रता  के  सामने  कुछ  नहीं 
उस  एक  बिंदु  जैसे सम्पूर्ण  नहीं 
शायद मेरा  अस्तित्व  खो  गया  है  इन अनगिनत  बिन्दुओं में 
इनकी  खींच-तान  में 
भगदड़ में... 

वापस  जाना  है  मुझे  उसी  स्थिति  में
उस  अस्तित्वहीन  अस्तित्व  में
उस 'एक  बिंदु'  अस्तित्व  में




यात्री, नाव या खेवैया

कितने आये कई गए, वो पराया था ये अपना है
खड़ा हूँ कबसे यहीं पर मैं, मुझे इंतज़ार अपना है |

कहाँ खो गया हूँ, ख़ुद ही, इसकी ख़बर नहीं मिलती
सोया हूँ या जागा, ये मैं ख़ुद हूँ या मेरा सपना है |

दिन गुज़र रहे हैं रातें भी, महीने और साल भी
वक़्त पे है ज़ोर किसका, वो जो कराये करना है |

सुना था वक़्त से ही है, वक़्त की हर शेह ग़ुलाम
सब चलता है इसके इशारों से, देखूं, मुझे क्या करना है |

खुशनसीबों को मिल गयी निजात, वक़्त के फेरों से
ज़िंदे बदनसीबों को क्या मालूम कब जीना कब मरना है |

कशमकश मिट गयी, असलियत दिख गयी ‘दोस्त’
मैं एक नाव, मैं ही खेवैया, मुझे ही पार उतरना है |



...धीरे धीरे

धीरे धीरे,
बसें, ट्रेनें बढ गईँ
और कम हो गयी जगह
खड़े रहने की,
लटकने की।
धीरे धीरे,

निगल गए झोपड़े
फुटपाथों को
कम हो गयी
चौड़ाई सड़कों की

धीरे धीरे,
बढ़ गई कीमत

मकानों की
वड़ा पाव की
चमक कारों की
इमारतों की
ऊंचाई कचरे के ढेरों की
धीरे धीरे,
गहरी हो गयी खाई,
इनके और उनके बीच की



ये भी...?

हेलो, कैसे हो?
ठीक हूँ
आज क्या इरादा है?

आज? आज कुछ अलग करते हैं
अलग? मतलब?
मतलब अलग जैसे कि ...
हाँ हाँ जैसे कि क्या ?
चलो आज कुछ सोचते हैं
सोचें? मगर ...
अरे ओरिजिनल आईडिया, बिल्कुल क्रियेटिव
बैठ जायें?
हाँ ठीक है
खडे खड़े तो मुश्किल हो जाएगा

काफी वक्त लग सकता है
अखिर सोचना है कोई मज़ाक तो नहीं
पहली बार भी है ना, सोचना 
ठीक है आओ बैठो
अच्छा तो बताओ क्या सोचें?
क्या मतलब?
मतलब ये कि किस चीज़ के बारे में सोचें?
ओहो! तो ये भी सोचना पड़ेगा ?



चंदा मामा दूर के

आओ कल्पना की उड़ान भरें
अपने कदम चांद पर धरें

चलो परखें चांद की ज़मीन को
आधे अँधेरे आधी रोशनी को

अपना भार चांद पर जांचें
हिरन के जैसे भरें कुलांचें

पहाड़ और पाताल में भागें
कोई पीछे तो कोई आगे

तोडें कीर्तिमान ऊंची कूद के
सब मिल गायें चंदा मामा दूर के











आज का सुपरमैन

मुट्ठी बांधी कस के, ऊपर को हाथ बढ़ाया
उठा शरीर हवा में, लो सुपरमैन आया

उतरा सौवीं मंज़िल पर आग बुझाने
घबराए सहमे लोगों की जान बचाने


गिरते बच्चे को पकडा, उड़ कर दिया सहारा
प्यार से उसे, अचंभित माँ के पास उतारा

कोयला बन गया हीरा, उसकी हथेली में दब कर
टूटते बाँध को बचा लिया, समय पलट कर

आज का सुपरमैन है तीन बातों पर निर्भर
क्लास्सिकल म्यूजिक, कराटे... और कम्पूटर


एक ग्रेजुएट शहर

एक दिन,
अचानक, एक दिन
चल गईँ गोलियाँ
हो गया
एक नेता का ख़ून
मच गयी इलाके में
अफ़रा तफ़री
स्कूल जाते बच्चे, काम पर जाती
डरी, सहमी, बदहवास जनता
भागने लगी इधर उधर

जान बचाने को

अगले सात दिनों तक चलीं …

खद्दर के कुर्तों और टोपियों की नारे-बाज़ी
जुलूस के साथ थे बांस के हाथ

लोहे के माथे और खाकी बदन ।
पन्द्रह दिनों बाद बैठा दिया गया
एक इनक्वाएरी कमीशन
और गाडी लाईन पर... ।

बीते कुछ दिन 
तीन, या शायद चार
एक और भीषण धमाका

आग की ऊंची ऊंची लपटें...
पट गयी ज़मीन कांच मिले ख़ून से
इस बार भी निपट गईँ
कई जानें
हो गईँ बंद बसें , ट्रेनें, दुकानें

लगा कि जैसे, अब 'उनकी' बारी है
...पर दो दिन में
इस बार शायद दो ही दिन में... 
सब सामान्य ।
गाड़ी फिर आ गयी,
लाईन पर
धीरे धीरे, समाप्त हो गयी
शहर की सम्वेदनशीलता ।
मन को झटक देने वाली
उत्तेजित करने वाली
शर्मिंदा करने वाली

हो गई समाप्त
हर बात 
शायद यही है 
एक शहर का 
ग्रेजुएशन ...

फिल्मी फिलोसोफी

कई वर्ष पहले इस कविता की पहली दो पंक्तियाँ मेरे एक मित्र, स्वर्गीय विभूती नाथ झा ने मज़ाक-मज़ाक में कह दीं थीं। इन्हें सुन कर सबको बड़ा मज़ा आया। मैंने सोचा कि ये लाईने भले ही हलकी फुल्की लगती हैं पर इनके अन्दर एक अलग तरह का वज़न है। इसलिए मैंने इन लाइनों को आगे बढ़ाने की सोची... तो ये रही मेरी कोशिश:

नहीं चाहिऐ डिज़ोल्व कभी भी मुझे,
ए मौत जब भी आना, कट से ही आना।

शूटिंग, एडिटिंग, हाई बैंड, बीटा,
किसी को लो बैंड से नीचे ना गिराना।

अगर मुक्कदर में फेड आउट ही लिखा हो,
ओटो-एडिट से है मुश्किल, पता लगाना।

मीटर की पीक पर हमेशा नज़र रहे,
नामुमकिन है डिस्टौरशन को ठीक कर पाना।

हम जानते हैं कितना जानते हैं हम, फिर भी,
नशा देता है टाइटल्स में अपना नाम आना ।

दुनिया में इन-आउट मार्क सभी के हैं 'दोस्त',
मेरी शॉर्ट फिल्म को ज़्यादा लंबी मत बनाना।


उचित जीवन

ये जो जीवन है 
जीवन में जो संतोष है 
संतोष में जो आनंद है 
सुख है 
उस सुख से मानव विश्वस्त रहता है 
आतंरिक विश्वास भय को दूर करता है
निर्भयता और विश्वास से मानव सही निर्णय करता है
जो सही निर्णय करता है वो जीवन में सदैव आगे बढ़ता है
आगे बढ़ना ही सफ़लता है
सफ़लता सुखी जीवन की कुंजी है
वो जीवन जिसमें संतोष है...

गुरुवार, 30 जुलाई 2015

एक सवाल

जिंदगी एक सवाल है
एक टेढ़ा सवाल

'?'
बिल्कुल ऐसा, टेढ़ा
जैसे किसीकी झुकी हुई गर्दन
इस सवाल का जवाब
ढूंढते ढूंढते
सोचते सोचते
एक ही जगह अटक गयी हो
उस सवाल की तरह ...
सब कुछ टेढ़ा है इस जिंदगी में 
इसलिए जब कुछ ऐसा
'!'
सीधा सादा मिल जाता है
तो विचित्र सा लगता है
... अचरज होता है!












ख़ाली पन्ने

ख़ाली  पन्नों की तरह दिन पलटते जा रहे हैं,
ख़बर नहीं के ये, रहे हैं या जा रहे हैं।

किसी रोज़ के चेहरे पर कोई नयी कहानी नहीं,
बस वही एक खामोश दास्ताँ दोहराए जा रहे हैं।

सुबह का उजाला करता है सबके दरवाज़े रोशन,
हमारी जिंदगी में तो बस तारीखें बदले जा रहे हैं।

चंद चाहनेवाले, कुछ यार-दोस्त और ढेर से ख़ैरख़्वाह,
पहुँच गए बहुत ऊंचे, अब पहुँच के बाहर होते जा रहे हैं।

समझ नहीं आया कहाँ भूल हुई, कैसे अटक गई गाड़ी,
दुनिया की भागमभाग को हम खिड़की से देखे जा रहे हैं। 

कहा वाइज़ ने अच्छे दिन तो कब के आ चुके 'दोस्त',
पर उन्हीं के इंतज़ार में हम बरसों गुज़ारे जा रहे हैं।

कभी कभी...

कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है 
कि जीवन के सफ़र में राही,
मिलते हैं साथ निभाने को 
जीवन भर ना सही
कुछ पल की खुशियाँ बढाने को
मंज़िल तक न सही,
कुछ क़दम साथ निभाने को

जीवन की खुशियों के साथ 
झूम झूम के नाचो गाओ
जो चला गया उसे भूल जाओ 
क्या पता इस साथ का मीठा स्वाद
आगे चल कर कड़वा हो जाये
इसकी महक बदल जाये

जो हो रहा है, सही हो रहा है 
जो होगा वो भी सही होगा 
इस सच से दोस्ती कर लो
तो ग़मों के सारे अफसाने,
अफसाने ही रह जायेंगे 
इस पुराने गीत की तरह -
'जीवन के सफ़र में राही
मिलते हैं बिछड़ जाने को'



बुधवार, 29 जुलाई 2015

चलो एक बार फिर से...

चलो एक बार फिर से हमसफ़र बन जाएँ हम दोनों

न मैं तुमसे कोई उम्मीद रखूँ अजनबीपन की
न तुम मेरी तरफ देखो, देखा हो जैसे ग़ैरों को
न मेरे पैर डगमगाएं साथ चलने में
न आँखें झुक जाएँ तुम्हारी, राह में मिल के
चलो एक बार फिर से...

तुमको नहीं उलझन अपनी ख़ाली ज़िन्दगी से
न कोई परेशानी मुझे अपने पत्थर दिल से
पर चले थे साथ तो शायद कुछ और भी चल लेते
अपने बीच उन बुझे दियों को रोशन कर देते
चलो एक बार फिर से...

ख़तम होने लगे रिश्ता तो उसको रोकना बेहतर
ज़िन्दगी बोझ बन जाये तो उसको बांटना अच्छा
ग़ज़ल जो बीच में ही रह गयी थी आधी अधूरी सी
उसे एक खूबसूरत शेर दे कर छोड़ना अच्छा
चलो एक बार फिर से...



राजू को नींद आयी


मैं ये सोच कर एक बाग़ में रुका था
कि कुछ देर रुक कर सुस्ता सकूंगा
बगीचे की
ठंडी हवा थी सुहानी
कुछ देर शायद सो भी सकूंगा
भटकते हुए मुझको दो दिन हो गए थे
खाना न सही, आराम तो मिलेगा
मगर उसने देखा, वो नजदीक आया
'सोना यहाँ मत', ये सुनके घबराया
थी उसकी आवाज़ भारी, फिर भी वो चिल्लाया
वक़्त की नज़ाकत को ज्यों ही मैं समझा
जल्दी से उठ के खड़ा हो गया मैं
खड़ा हो गया मैं
दफ़ा हो गया मैं
दफ़ा हो गया मैं

मंगलवार, 28 जुलाई 2015

इश्क, एक ख़याल से

मैंने शायद तुम्हें पहले भी कभी सोचा है 
अजनबी तो हो
मगर इसी दिल में कहीं रहती हो
अनकही भी हो
पर मेरी ग़ज़ल लगती हो
वाकिफ हूँ मैं तेरी महकती घनी जुल्फों से 
जिनकी खुशबू मेरी साँसों में घुली हैं
जिनके अँधेरों से मेरी रातें बनी हैं
देख कर तुमको
किसी मूरत की याद आती है
एक ख्याल की जिंदा
सूरत नज़र आती है

याद है मुझे आज भी
उस दिन का वो अँधेरा पहर 
हाथों की मज़बूत पकड़
और उनके छूटने का डर

ये तो होना ही था
अब न तो तुम हो
न है तुम्हारा साथ
मेरा ख़ाली हाथ ढूँढ़ता है
वो  नर्म हाथ ...

शायद इश्क था मुझे
इस ख़याल से

मेरे ख़याल से

एक ख्वाहिश ऐसी

हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी, ऐसी ऐसी, ऐसी ऐसी कि पूछो मत कैसी कैसी बेहद अजीब हों जैसी बिल्कुल नामुमकिन हों वैसी कभी कभी तो  मुझे  लगता है  मैंने कह...