रविवार, 12 जुलाई 2015

मेरा अस्तित्व, मेरी छाया

दिन को धूप की तेज़ रोशनी है
सुबह, शाम एक नारंगी एहसास है
रात को चांदनी का ठंडा उजाला है
अगर कहीं ये सब नहीं है
तो वहां बिजली है
उसकी की चमक है
तेज़ उजाले में स्वयं को चमकता देख कर
मन गर्व से भर जाता है
विश्वास हो जाता है कि लोग मुझे ही देख रहे हैं
और ये भी कि
वो मुझे देख कर प्रसन्न हैं
ये बेबुनियाद जानकारी
मेरे अभिमान को बढ़ाती है
मेरे गर्व की छाया मेरे साथ चलती है
चलती रही है
कभी कभी मैं उसे मुड़ के देख  लेता हूँ
बड़ा संतोष होता है
उसे पीछे पीछे आते देख कर
कैसे पिछलग्गू की तरह साथ रहती है
क्या जीवन है इस बेचारी का भी
पीछे पीछे रहना बस
कोई मांग, क्रोध, कोई दुःख

सुना था पर जब देखा तो  पता चला
ये रौशनी हमेशा रहने वाली नहीं थी
अँधेरा आया और बिना किसी प्रयत्न के
निगल गया रोशनी को
और मेरी छाया को
रौशनी ने मेरा साथ छोड़ा तो
छाया भी साथ नहीं रही
वो घुल गयी अँधेरे ही में
छाया के साथ ही मिट गया मेरा गर्व
मेरा अभिमान
मेरी पहचान
मेरा अस्तित्व भी

कदाचित

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