सोमवार, 13 जुलाई 2015

मिट्टी गिरने से पहले

पता नहीं कितनी ज़िन्दगी जी गया मैं
तेरी पलकों के साये के बग़ैर 
साये के सहारे के बग़ैर  
सुकूं के बिना
नींद के बग़ैर 
ना-फ़िक्र लम्हों के बिना 
तेरी गर्मी--मोहब्बत,
आगोश की नरमी के बग़ैर

फिर से पोंछ दे मेरे आंसू 
अपने दुपट्टे के कोने से 
भर ले मेरे पसीने के मोती
अपनी नर्म हथेली में 
और आख़िर 
अगर हो सके
तो अपनी सियाह जुल्फों से
अँधेरा कर दे चेहरे पर मेरे
मूँद लूं मैं आंखें
आखिरी बार 

मिट्टी गिरने से पहले

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