रविवार, 19 जुलाई 2015

... ख़ुदा ख़ैर करे

बड़ी दिलकश है उफ़, ये मुस्कान, ख़ुदा ख़ैर करे
कन्धों पे जा ठहरी ज़ुल्फों की ढलान ख़ुदा ख़ैर करे

वो चांदी सी चमकती बालियाँ ज़ुल्फों की जानिब से
घटाओं में जैसे बिजली की चमकार, ख़ुदा ख़ैर करे

गुलाबी रेशम के रंग की रंगत है, चेहरे पे शायद
या रेशम ने है चुराया चेहरे का गुलाब ख़ुदा ख़ैर करे

किस खुशकिस्मत पे इतनी खुश हो, हम भी ज़रा सुने
ग़लत फहमी के होंगे कितने शिकार, ख़ुदा ख़ैर करे

हम तो तस्वीर पर ही डाल चुके हथियार 'दोस्त'
रूबरू हुए तो क्या होगा हाल, ख़ुदा ख़ैर करे



कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

एक ख्वाहिश ऐसी

हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी, ऐसी ऐसी, ऐसी ऐसी कि पूछो मत कैसी कैसी बेहद अजीब हों जैसी बिल्कुल नामुमकिन हों वैसी कभी कभी तो  मुझे  लगता है  मैंने कह...