शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

एक ग्रेजुएट शहर

एक दिन,
अचानक, एक दिन
चल गईँ गोलियाँ
हो गया
एक नेता का ख़ून
मच गयी इलाके में
अफ़रा तफ़री
स्कूल जाते बच्चे, काम पर जाती
डरी, सहमी, बदहवास जनता
भागने लगी इधर उधर

जान बचाने को

अगले सात दिनों तक चलीं …

खद्दर के कुर्तों और टोपियों की नारे-बाज़ी
जुलूस के साथ थे बांस के हाथ

लोहे के माथे और खाकी बदन ।
पन्द्रह दिनों बाद बैठा दिया गया
एक इनक्वाएरी कमीशन
और गाडी लाईन पर... ।

बीते कुछ दिन 
तीन, या शायद चार
एक और भीषण धमाका

आग की ऊंची ऊंची लपटें...
पट गयी ज़मीन कांच मिले ख़ून से
इस बार भी निपट गईँ
कई जानें
हो गईँ बंद बसें , ट्रेनें, दुकानें

लगा कि जैसे, अब 'उनकी' बारी है
...पर दो दिन में
इस बार शायद दो ही दिन में... 
सब सामान्य ।
गाड़ी फिर आ गयी,
लाईन पर
धीरे धीरे, समाप्त हो गयी
शहर की सम्वेदनशीलता ।
मन को झटक देने वाली
उत्तेजित करने वाली
शर्मिंदा करने वाली

हो गई समाप्त
हर बात 
शायद यही है 
एक शहर का 
ग्रेजुएशन ...

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