शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

फिल्मी फिलोसोफी

कई वर्ष पहले इस कविता की पहली दो पंक्तियाँ मेरे एक मित्र, स्वर्गीय विभूती नाथ झा ने मज़ाक-मज़ाक में कह दीं थीं। इन्हें सुन कर सबको बड़ा मज़ा आया। मैंने सोचा कि ये लाईने भले ही हलकी फुल्की लगती हैं पर इनके अन्दर एक अलग तरह का वज़न है। इसलिए मैंने इन लाइनों को आगे बढ़ाने की सोची... तो ये रही मेरी कोशिश:

नहीं चाहिऐ डिज़ोल्व कभी भी मुझे,
ए मौत जब भी आना, कट से ही आना।

शूटिंग, एडिटिंग, हाई बैंड, बीटा,
किसी को लो बैंड से नीचे ना गिराना।

अगर मुक्कदर में फेड आउट ही लिखा हो,
ओटो-एडिट से है मुश्किल, पता लगाना।

मीटर की पीक पर हमेशा नज़र रहे,
नामुमकिन है डिस्टौरशन को ठीक कर पाना।

हम जानते हैं कितना जानते हैं हम, फिर भी,
नशा देता है टाइटल्स में अपना नाम आना ।

दुनिया में इन-आउट मार्क सभी के हैं 'दोस्त',
मेरी शॉर्ट फिल्म को ज़्यादा लंबी मत बनाना।


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