रविवार, 26 जुलाई 2015

पूरे, आधे-अधूरे

सोचता हूँ चला जाऊं वहां
... जहाँ
नहीं नहीं, ग़लत मत समझो
मुझे कोई गिला नहीं तुमसे
तुम्हारे उन वादों से
रोज़ मिलने की कसमों से...
तुम रहने दो अपने वादे
अपनी वो कसमें
आधी अधूरी ही
कर लूँगा मैं उन्हें पूरी
कहीं और ... जहाँ

फिर ये ज़रूरी तो नहीं
कि सब कुछ पूरा ही हो ज़िन्दगी में
आधे अधूरे भी
खूबसूरत हो सकते हैं
होते हैं
अधखिली कलियाँ कम नहीं होतीं
खिले फूल से
आधी मुस्कान
आधा चाँद
अर्ध नग्न अवस्था
आधा छुपा चेहरा
चुराया हुआ आधा चुम्बन
आधी ना आधी हाँ

ख़ैर, जा तो रहा हूँ 'दोस्त'
पर शायद आधे मन से
ढूँढने वो जहाँ, जहाँ
अधूरे ख्वाबों की
अधूरे वादों की
अधूरे रिश्तों की
अधूरी ही सही
पर इज्ज़त होगी,
तारीफ होगी अधूरेपन की
कोई ऐसा जहाँ... वहां


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