सोमवार, 27 जुलाई 2015

ये दुनिया यहीं रहेगी

बीत रहा है वक़्त
कट रही है ज़िन्दगी
सारे नक़्शे देख लिए
अब न कोई राह बची
न बचा चौराहा कोई
न कोई सड़क, न मोड़
न कोई रहनुमा, न मंज़िल
पर रास्ते के नाम पर है
एक पगडंडी
सांप सी बल खाती,
दूर तक जाती दिख रही है
मेरे पैरों तले है जिसकी पूंछ
पर सर दिखाई नहीं देता
शायद आगे होगा
वहां उन पहाड़ों से आगे
उस घाटी के परे
पता नहीं कहाँ होगा
या कहीं होगा भी या नहीं
वो जहाँ भी होगा
ये दुनिया वहीं खत्म होगी
जैसे हर चीज़ ख़त्म हो जाती है
पर ये दुनिया वहां ख़त्म होगी
क्या ये कहना सही होगा ?
शायद नहीं, बिलकुल नहीं
जो हमें दिखाई नहीं देता
ज़रूरी नहीं कि वो नहीं होगा
ये हमारी आँखों की मजबूरी हो सकती है
नज़रों की हद्द हो सकती है
दिमाग़ की कमज़ोरी हो सकती है
दुनिया की हद्द नहीं हो सकती
ये दुनिया कहीं ख़त्म नहीं हो सकती
इंसान जिस जहान को जानता है
इंसान ने जिस जहान को
छुआ है, ख़ुद बनाया है
वो भले ख़त्म हो जाए
पर जो ज़मीं उसने देखी ही नहीं
उसकी रवानी कैसे ख़तम होगी
वो तो चलती रहेगी
कोई सुने या न सुने
अपनी कहानी कहती रहेगी

गुज़र जायेंगे हम
गुज़र जाओगे तुम
मिट जायेंगी मुसकानें
धूल हो जायेंगे ग़म
ख़तम हो जायेंगे कहने वाले
राख हो जायेंगे सुनने वाले
पर ये दुनिया... यहीं रहेगी
और कहती रहेगी
अपनी ज़बानी
अपनी कहानी
हम सब की कहानी...







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