रविवार, 19 जुलाई 2015

मैं और मेरी झील

कोई आया, कोई गया
कोई न आया
मुझे कुछ ना हुआ
उसने कुछ कहा,
मैंने कुछ न कहा
वो चुप न रहा
मैं खुश रहा
वो बोलते रहे चीख़ते रहे
मैं सुनता रहा
वो आये साथ साथ
पिये खाए साथ साथ
एक दूसरे से ऊंचे 
हँसे, खिलखिलाए साथ साथ
मैं देखता रहा
सुनता रहा

किसी ने कहा
उसकी अक़्ल सबसे बेहतर है
मगर उसकी ज़िन्दगी बदतर है
सौतेला समझा उसे ज़िन्दगी ने
इस शिकायत को
उतनी ही आसानी से
किसी ने ग़लत कहा
अपनी नज़र में
हर एक शख्स
दूसरे से बेहतर है
मगर आप क्या हैं आप कौन हैं
ये दूसरे जानते हैं
आप से बेहतर
पर ये राज़ कोई नहीं जानता

ख़ैर, ये सब ख़त्म तो होना ही था
सो हो गया
सब उठ गए
आवाजें आहिस्ता हुईं
लफ़्ज़ कम हो गए
दरवाज़ा कुछ देर खुला रहा
फिर बंद हो गया
अपने पराये, सब चले गए
मैंने खुद की तरफ देखा;
क्या मैं पहले से ज्यादा खुश हूँ ?
परेशान हूँ ?
या शायद ज्यादा अकल्मंद हूँ ?
फिर अन्दर झांका
परखा, जांचा
पर कोई फर्क न पाया

बत्तियां बुझ गयीं
मैं बिस्तर पर लेट गया
चादर ओढ़ ली 
साथ ही
एक सफ़ेद कोहरे की चादर
मन की झील पर छा गयी
झील शांत हो गयी
फिर सो गयी
अपनी झील की गोद में
चेहरा छुपा के
मैं भी सो गया

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