मंगलवार, 14 जुलाई 2015

शर्त दोस्ती की

आजकल मन ज़रा बोझिल सा है 
देख कर दुनिया को
खुद को, खुद की शकल को 
अपने घर को 
दर--दीवार को 
दीवार की बदरंगी को 
बदरंगी दीवार की दरारों को 
दोस्तों के मिज़ाज को 
अपनों के तेवर को 

अब फैसला हो ही जाना चाहिए 
देर से नुकसान बढ़ सकता है 
बर्दाश्त की हद्द से गुज़र सकता है 
असली मुद्दा है 'क्यों'  
आखिर क्यों बर्दाश्त करे कोई 
अगर तुमको अपनी बातों में मायेने नज़र आते हैं 
और मेरा हर लफ्ज़ मज़ाक 
तो हम दोस्त नहीं दुश्मन हैं
अगर तुम्हें लगता है कि तुम जेल में हो
तो मैं भी यहाँ मर रहा हूँ घुट घुट कर  
जिस तरह तुम्हें फ़ख्र है अपनी अक़ल पर
वैसे ही मुझे भी घमंड है अपनी सोच पर
मैं अपनी बेईज्ज़ती बर्दाश्त कर लूं
पर अपने ख्यालों के बारे में कुछ नहीं सुनूंगा
बिलकुल तुम्हारी तरह
मेरे ख्याल मुझे भी प्यारे हैं 
दुनिया में सबसे न्यारे हैं 
खूबसूरत हैं 
अक़्ल से भरे पूरे हैं 
इनमें कोई कमी नहीं 
किसी को हक नहीं इनको ग़लत कहने का 
इनकी बेईज्ज़ती करने का 
ये मेरे दिमाग़ की उपज हैं 
ये पाक हैं 
ये मेरे भगवान हैं 

शायद हमारी दोस्ती की सबसे ज़रूरी शर्त होगी 
इज्ज़त मेरे विचारों की 
मेरे ख्यालों की 
तुम मुझे कुछ भी कह लो 
मेरी शक्ल का  
मेरे कपड़ों का मज़ाक उड़ा लो 
पर अगर तुमने कहा
कि मैंने जो कहा, वो गलत था 
तो 'दोस्तवक़्त बर्बाद मत करो 
मैं इस तरफ मुड़ता हूँ
तुम उस तरफ मुड़ लो

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