सोमवार, 2 नवंबर 2015

मेरे बेवफ़ा ख़याल

ये है एक ख्याल
जो आया मुझसे मिला
और कहा मुझे तुम पसंद आये
क्या मैं तुम्हारे साथ रह सकता हूँ
तुम्हारी क़लम की रोशनाई से ढ़ल सकता हूँ
हड़बड़ी में हिचकिचाते हुए
गड़बड़ी में क़लम उठाते हुए
मैंने कहा क्यों नहीं
तुम मुझे इतनी इज़्ज़त दे रहे हो
तो आओ, रहो मेरे पास
मेरे ख्यालों में
मेरी कविता में, शायरी में
मुस्करा कर वो यहाँ उतर आया
अब वो सबके सामने इतराता है
अपनी जगह दिखाता है
और बड़ा खुश लगता है

पर जनाब इससे भी बेहतर
खूबसूरत ख्याल भी मिले
दूर से बेहद मज़ेदार भी लगे
एक तो मेरे गुसलखाने में नहाते वक़्त पहुँच गया
बड़ा अटपटा लगा मुझे
पर सोचा इतना ख़ूबसूरत ख्याल!
मैंने उनका नाम ले लिया
एक दो को ज़ोर से बोल भी दिया
कि याद रह जाएँ
मेरे साथ मेरे ज़ेहन में बस जाएँ
पर मुझे खूबसूरती पर भरोसा नहीं है
वो आपके पास रुकते नहीं
उन्हें घमंड है खुद पर
वो किसी और की कविता बनाना चाहते हैं
किसी ज़्यादा मशहूर और अक़्लमंद की
जिसका दुनिया में पहले बड़ा नाम हो
काम कैसा भी हो
पर ऊंचे दाम हों

खैर 'दोस्त' गुसलखाने से जो मैं बाहर आया
कागज़ क़लम दावत को सजाया
बड़े शौक़ से जो सर झुकाया
तो उस ख्याल को नदारद पाया

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