मंगलवार, 15 अगस्त 2017

कुछ नहीं, पर अँधेरा तो है

इतना अँधेरा !
कहाँ से आया ये अँधेरा 
ये इतना घना क्यूँ है
ये अँधेरा सिर्फ बाहर ही नहीं है 
ये मेरे दिल में, मेरे रोम रोम में घर कर चुका है 
शायद मेरा चेहरा भी काला हो गया होगा 
मेरे हाथ पैर, पेट, पीठ 
सब कुछ अँधेरे रंग में रंग गए होंगे
कुछ नज़र नहीं आ रहा 
अपनी हथेली तक नहीं  
क्या ये रात है? 
पर कहाँ गया वो चाँद ?
वो चाँद, तारे, वो टिमटिमाते सितारे
मेरी रोशनी के सहारे 

आज ठंड भी बहुत है 
काश ऊपर कुछ गरम होता 
कोई ऊनी कोट या कम्बल 
या - सिर्फ तुम्हारे होने का एहसास 
तुम्हारी नज़दीकी की गरमाहट
नरम हाथों की पकड़
उन खूबसूरत आँखों की रोशनी
आलिंगन की गरमी 

ज़िन्दगी कितनी खाली सी हो चुकी है 
कितनी नीरस, ठंडी 
अब इस घने अँधेरे में मैं तुम्हें कहाँ ढूँढूँ 
और कैसे ढूँढूँ 
किस तरफ जाऊं 
इस दुनिया में कोई ना दिखाई दे
कोई बात नहीं 
पर तुम न दिखोगी 
तो ये ऑंखें किस काम की  
मुझे इनकी ज़रुरत ना होगी 
तुम्हारा हाथ मेरे हाथ में न हो 
तो मेरी नब्ज़ किस काम की 
तुम्हारा सर मेरे सीने पर न हो 
तो ये धड़कन किस काम की


सोमवार, 7 अगस्त 2017

मेहमान दर्द

एक दिन ऐसा एहसास हुआ मुझे
कि जैसे किसीने पुकारा हो मुझे 
देखा इधर उधर 
पर न आया कोई नज़र 
फिर किसीने हल्के से छू दिया मुझे 
घबरा के मैंने पूछा,

"कौन हो भाई दिखाई क्यों नहीं देते"

एक सकपकाई सी आवाज़ आई
"जी मैं यहीं हूँ, आपके बिलकुल नज़दीक"

बग़ैर देखे ही मैंने तीर चला दिया 
"जनाब मैंने पहचाना नहीं 
हम पहले मिले हैं क्या?"

"जी अभी तक तो नहीं"

"तो फरमाएं, कौन हैं आप"

"जी मैं, मैं एक दर्द हूँ"

"दर्द ? आपको मुझसे क्या सरोकार है"

"जी ... रहने को जगह मिलेगी कुछ दिन के लिए"

"जी! रहने को जगह?
नहीं भाई मुश्किल है मेरे लिए आपको जगह देना 
देखो न मेरे सारे ख़ाने आराम से भरे हैं 
अब आराम से आराम करते हुए आराम को निकाल कर
दर्द को जगह देना बेवकूफी होगी ना 
मेरी कितनी बदनामी होगी कुछ ख़बर भी है आपको"

"अरे जनाब इतने बड़े जिस्म में कोई तो ऐसा ख़ाना होगा 
जहाँ आराम इतना ज़्यादा हो कि मेरा पता ही न चले"
"हैं ! क्या ऐसी भी कोई जगह हो सकती है? पर आप कौन से दर्द हैं 
मसलन सर के पेट के या ..."
"नहीं नहीं ऐसा नहीं है हम तो जहाँ चले जाएँ वही नाम ले लेते हैं 
मसलन सर दर्द, पीठ दर्द, पेट दर्द वगैरह"
"हम्म ..."
"जी ज़रुरत पड़े तो हम हाथ की उंगली में भी रह लेंगे 
पर अगर दो में से एक घुटना मिल जाता तो  क्या बात थी

"ये तो आप ज़्यादती कर रहे हैं 
आराम की भी अपनी ज़िन्दगी है"

"अरे बहुत कर लिया आराम 
अब हमारे जैसे बेसहारों को भी जगह मिलनी चाहिए 
और कितनी रंग बिरंगी विटामिन की गोलियां निगलोगे
अपने अंदर का माहौल तो एक दिन बर्बाद होना ही है  
फिर उस बर्बादी के पैसे भी देने होंगे
मियां अब आराम का वक़्त जाता रहा 
अब ज़माना है परेशानी का
नई नई तरह तरह की अजीबो ग़रीब परेशानियां
इनसे आदमी का दिमाग़ ज़्यादा चलने लगता है 
अरे जब किसी मुसीबत को टालना हो तो नए तरीके ईजाद करने पड़ते हैं 
है कि नहीं?
तो जनाब अगर आप हमें रहने की जगह दे दें
तो आप इससे कहीं ज़्यादा अक़लमंद हो जायेंगे 
ये वादा है"

"आपकी जिरह का भी जवाब नहीं 
ठीक है, तो आइये
जहाँ जगह मिले रह जाइये  
आराम से तमीज़ से बात कीजियेगा" 

इसके बाद तो जनाब कलाई से लेकर सर तक 
कंधे से एड़ी तक 
पेट, पीठ, कमर हर जगह भर गयी दर्द से 
हक़ीम के माथे की शिकन बढ़ गयी
दवाएं धीरे धीरे कम हुईं
फिर बंद हो गयीं
उनके दोनों हाथ दुआ पर आकर ठहर गए 
कहा अब कोई इलाज नहीं 
लुत्फ़ लीजिये इनका 
दर्द ही तो है कोई मौत तो नहीं 

बात मुझे सही लगी 
उसके पीछे का जज़्बा भी सही लगा
भई अब ये बिचारे कहाँ जाते?
सोच के मैंने इन्हें अपना लिया 
अब ये सारे दर्द मेरे हैं 
मेरे अपने हैं 
ये मुझे ज़्यादा तकलीफ भी नहीं देते 
हो सकता है आदत पड़ गयी हो  
ये सब अब मेरे साथ ही रहेंगे 
मैं इनका साथ आख़ीर तक न छोड़ूंगा
अब हम बिछड़ेंगे 
तो उस गर्म माहौल में
जब मुझे ख़ुद से, इनसे और इन्हें मुझसे 
मिल जाएगी निजात

आख़ीर में हम इस नतीजे पहुंचे 'दोस्त'
कि दर्द और परेशानियां तो हमेशा ही रहेंगी
पर आप उनके दोस्त बन कर रहोगे
या उनकी दुश्मनी मोल लोगे?

मंगलवार, 25 जुलाई 2017

कुछ भी

फिर, फिर क्या हुआ
फिर? फिर क्या होना था
क्या होना था? अरे मगर हुआ क्या
तू भी यार, अरे वही जो होना था,
मतलब?
मतलब कुछ खास नहीं
हे भगवान!
क्यों इतनी भक्ति में डूब गया?
अबे भक्ति छोड तू अपने इस व्यक्तवय का मतलब ज़रा समझायेगा मुझे
व्यक्तवय ? अरे दो शब्द व्यक्तवय हो जाते हैं क्या?
अबे उल्लू के पट्ठे मैंने पूछा था की उस दिन क्या हुआ था
ये लो। अब ये कौन से दिन की बात है?
एक मिनट, रुक ज़रा
ले रुक गया
तेरे घर में थोड़ी दारू है?
'दारू'? अबे पगला गया है? दोपहर के तीन बजे हैं। दारू!
इजाज़त हो तो आपकी तारीफ़ में कुछ कहना है
इरशाद, ज़रूर कहिये
ग़ौर फरमाएं, तेरे जैसे बन्दे से सर खपाना हो
तेरे जैसे बन्दे से ग़र सर खपाना हो
तो 'दोस्त' सुबह चार बजे भी पीनी पड़ सकती है... मुक़र्रर ? नहीं ?
अरे यार तू तो वाकई बड़ा परेशान लग रहा है आज
नहीं नहीं परेशानी कैसी, मैं तो बस ऐसे ही
आज कोई और मुद्दा नहीं है तेरे पास?
अच्छा सुन
चल सुना
तूने किसी जासूसी दफ्तर में नौकरी कर ली है क्या
क्यों, तुझे कैसे पता चला
तू किसी बात का सीधा जवाब ही नहीं दे रहा

कट, बस। बढ़िया हुआ। अगले हफ़्ते दोनों टाइम पर आ जाना ।



गुरुवार, 13 जुलाई 2017

मेरा ख़ज़ाना

धीरे धीरे ही सही
पर कुछ तो है, जो अब नहीं है
मतलब मेरे पास नहीं  है 
शायद चुरा रहा है ये ज़माना
मेरा ख़ज़ाना 
पहले तो ग़ुम हो जाती थीं सिर्फ चीज़ें
एक कमीज़, एक घड़ी, एक कोट
पूर्वजों की दी सोने की एक अंगूठी 
मेरी प्यारी आर्मी की जैकेट 
किसीने कहा था उस जैकेट में
तुम बहुत अच्छे लगते हो 
मैंने कहा चलो अब जैकेट न सही 
जैकेट वाली फोटो तो है
उसी से गुज़ारा कर लो

बात उस तक पहुंची है तो
उन ख़तों तक भी जाएगी
उन लफ़्ज़ों को फिर से रोशन कर जाएगी
हाँ वो ही
उसके वो पुराने सहेज के रखे चंद ख़त
जो उसकी ज़ुल्फ़ों के अँधेरे की तरह
अब नहीं दिखाई देते 
उनकी खुशबू की तरह 
उनका वजूद अब एक एहसास से ज़्यादा कुछ नहीं 
और वो लम्बा सा 
घास का एक टुकड़ा
जो पहली और दूसरी कहानी के 
दो पन्नों के बीच
हमेशा ही दबा रहा 
वो भी शायद गिर गया कहीं
टुकड़ा वो घास का हो सकता है
पर उसका काम बेहद ज़रूरी था 
वो मेरी दोनो कहानियों को अलग रखता था
उस आख़िरी मुलाक़ात के दिन 
उसीने बग़ीचे से तोड़ के दिया
और क़िताब बंद कर दी थी 

अब ख़ैरियत इसी में है
कि चीज़ों को खोने का
रिश्तों के नर्म होने का 
यादों के धुंधले होने का 
उस कमीज, जैकेट और अंगूठी का 
बंद कर दूँ मातम मनाना
ख़ुशक़िस्मती से 'दोस्त' 
क्योंकि कोई चुरा नहीं पायेगा
मेरा ये अंदाज़ आशिकाना
और ख़याल शायराना

बुधवार, 5 जुलाई 2017

ट्रेन कहानियां

ट्रेन बस छूटने ही वाली थी। रेलवे के कई कर्मचारी अपने अपने काम में जुटे थे। एक जत्था डिब्बों के नीचे कुछ ठोक बजा के देख रहा था, तो दूसरा ऊपर चढ़ कर नज़र मार रहा था। कुछ लोग प्लेटफार्म पर भी अलग-अलग किस्म का काम कर रहे थे। मसलन, लोगों के टिकट चेक किये जा रहे थे । कुली अपने सर पर भारी सामान ढ़ो रहे थे। ट्रेन के अंदर भी रेल के कई लोग थे। कुछ सफाई देख रहे थे, कुछ यात्रियों को उनकी जगह दिखा रहे थे। बुज़ुर्गों का सामान सही जगह रख रहे थे। यात्रियों के भोजन और चाय पानी की सूची बन रही थी । जी आप शाकाहारी हैं? कटलेट और इडली है। नॉनवेज में ऑमलेट है…
इन सबके अलावा ट्रेन के आसपास, ट्रेन के अंदर और ट्रेन से बहुत दूर - और भी बहुत कुछ होता है। एक तो वो स्टेशन जहाँ से ट्रेन छूट रही है, दूसरा ट्रेन के अंदर और तीसरा वो स्टेशन जहाँ ट्रेन जा रही है। इन तीनों स्थानों में क्या-क्या घट रहा है, इसकी जानकारी सिर्फ एक ही इंसान को हो सकती है, वो है इसका लेखक - जो कि मैं हूँ।

एक

हर ट्रेन एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक यात्रियों को ले कर जाती है। ट्रेनें चलती ही यात्रियों को एक से दूसरे स्थान ले जाने के लिए हैं। जिन्हें भी जहाँ जाना होता है वो उस स्थान का टिकट खरीदते हैं और टिकट में दिए नंबर वाली सीट पर बैठ जाते हैं। स्टेशन पर दो तरह की भीड़ होती है। एक तो वो जिन्होंने कहीं जाना होता है और दूसरे वो जो उन लोगों को छोड़ने आये हैं। जो लोग जा रहे हैं वो के ट्रेन के अंदर चले जाते हैं। बाकी बाहर रहते हैं। ऐसे मौके ज़रा भावुक हो जाते हैं। गार्ड की सीटी और फहराती हुई हरी झंडी से परेशानी और बढ़ जाती है। लोगों की ऑंखें भीग जाती हैं। कई तो खुल के रो लेते हैं। सफ़ेद रुमाल चेहरों का गीलापन सोखते नज़र आते हैं। जो यात्री हैं उनकी मानसिक स्थिति कुछ भिन्न होती है। वो इतने उदास नहीं दिखते। शायद उस यात्रा के रोमांचक कारणों से। शायद वो किसी खास व्यावसायिक काम से जा रहे हों। या फिर अपने किसी प्रिय से मिलने। या शायद छुट्टी के लिए ही सही... आख़िर ट्रेन चल पड़ती है। प्लेटफार्म वाले लोग धीरे धीरे पीछे जाने लगते हैं। क़द में छोटे होते जाते हैं। काफी देर तक सफ़ेद रुमाल दिखाई देते हैं। हिलते हुए हाथ दिखाई देते हैं। फिर सब ओझल... होने लगते हैं, प्लेटफार्म , फिर स्टेशन, फिर शहर...
ट्रेन और उन सब लोगों के बीच का अंतर बढ़ता ही जाता है। धीरे धीरे लोग इस हर क्षण बढ़ते हुए अन्तर के बारे में सोचना छोड़ देते हैं।

दो

चलिए अब जो लोग ट्रेन के अंदर बैठे हैं, उन पर नज़र डालते हैं। इन सब लोगों के बीच का अंतर बिलकुल नहीं बदलेगा। ये सब अपनी अपनी कुर्सी पर हैं इस वजह से किन्ही भी दो सीटों के बीच की दूरी बदली नहीं जा सकती। असल में इन सबके पास कोई चारा भी नहीं है, दूर या पास आने जाने का। इनके पास एक ही विकल्प है, बस बैठे रहो। किसी के पास ये शक्ति नहीं है कि वो किसी को या खुद को हटा सके। अगर ये चाहें तो दुसरे यात्रियों को देखें, और चाहें तो उनसे दोस्ती भी कर लें। असल में कई लोग यही करते हैं। शुरुआत एक मुस्कान देने से हो सकती है, फिर कुछ खाना पीना, नाम पता और कभी कभी जोक्स भी। एक डिब्बे में बंधक जैसे बैठने से कई लोग ऊबने लगते हैं। अगर एक अपने पिछवाड़े को नीचे खिसकते हुए मुंह फाड़ेगा तो उसके सामने वाला भी, फिर कोई और, और फिर... ट्रेन की लगातार खटखट खटखट से बोरियत का एक जाल सा बिछ जाता है . चेहरे के सारे भाव मिट जाते हैं। आँखें अलसाने लगती हैं। इसके कुछ देर बाद उनके लिए ट्रेन, उसकी खटखट, बाहर के दृश्य, सबके अस्तित्व समाप्त हो जाते हैं।

तीन

दूर कहीं एक ख़ाली प्लेटफार्म पर मंदिर के घंटे जैसी आवाज़ सुनाई दी है। टनटन टनटन टनटन। काले कोट वाला एक आदमी अपने कमरे से बाहर निकला, चारों तरफ नज़र घुमा कर फिर वापस चला गया। छोटी सी एक कैंटीन में खोमचे वाले अंगोछे से मक्खियों को हटाने लगे हैं। इन आदमियों को पूरा आराम मिल गया और मक्खियों को भर पेट भोजन। चाय को चौथी बार गरम करने के लिए चढ़ा दिया गया। कुछ नीली वर्दी वाले पटरियों पर उतर आए हैं और हथौड़े से किसी लोहे के हिस्से को ठोक रहे हैं। स्टेशन मास्टर को बाहर वाले सिग्नल से कड़कड़ करता संदेश आया है। “ट्रेन पास हो रही है साहब”। इसका मतलब पांच मिनट में आ जाएगी। अरे भाई सुपर फ़ास्ट होती तो दो मिनट में निकल भी जाती। पर ये तो रुकने के लिए सिलो हो जाएगी ना। स्टेशन के बाहर कुछ कारें, टैक्सी, ऑटो और साइकिल रिक्शा वगैरा से लोग उतर रहे हैं। ये लोग उन लोगों को लेने आये हैं जो ट्रेन से उतरेंगे। कई लोग तो पहले से ही प्लेटफार्म पर इंतज़ार कर रहे हैं। इनमे से एक अक्सर प्लेटफार्म किनारे से झुक कर देखता रहा है। अब तो सिग्नल हो गया है। ट्रेन भी दिखाई दे रही है। "आ गयी आ गयी, कुली, चलो भाई चलो "। जैसे जैसे ट्रेन की दूरी कम हो रही थी, प्लेटफार्म पर लोगों की धड़कनें बढ़ रही थीं। एक युवती मेंहदी वाले हाथों में पूजा की थाली लिए है। उसमें रखा दिया किसीके झुर्रियों वाले हाथों ने जला दिया। वहां कुछ खादी के सफ़ेद कुर्ते भी हैं। उनके हाथों में फूलों के कई मोटे मोटे हार हैं। ट्रेन को देख कर बुज़ुर्ग पति पत्नी आगे बढ़ते हैं। खादी के धक्के से आदमी चौंक जाता है। ट्रेन एक लम्बी तीखी सी आवाज़ करते हुए धीरे धीरे रुक जाती है। फूलों के हार अब एक खादी की मोटी गर्दन में हैं। मिलिट्री की टोपी के आगे पूजा की थाली घूमती है। एक लड़की गले में स्टेथेस्कोप लिए बूढ़े माँ बाप के चरण स्पर्श करती है। गार्ड की सीटी सुनाई देती है। हरी झंडी लहराती है। यहाँ के सभी कलाकार अब प्लेटफार्म खाली कर रहे हैं।

ट्रेन एक बार फिर चल पड़ी है, एक और कहानी लिखने।



रविवार, 2 जुलाई 2017

क्या करें क्या ना करें

अब वक़्त आ पहुंचा है वहां, जहाँ
इसे बहुत वक़्त पहले पहुँच जाना चाहिए था 
वक़्त की मीठी बातों में उलझे रहे हम 
हमें इसका इंतज़ार ही नहीं करना चाहिए था
अगर कुछ करना था तो उठते और उठ कर, कर देते 
किसीकी हामी या आँख के इशारे को नहीं देखना चाहिए था 
चलो अब तो जो हुआ सो हुआ,
कर चुके जो भी करना या ना करना चाहिए था 
बड़े खुश थे हम हज़ारों दिन जेब में लिए 
जोश में खर्च कर दिए आधे, जो क़तई नहीं करना चाहिए था 
कोई तो बताये कि हमने क्या सही, क्या ग़लत किया 
क्या हम वो सब ही करते रहे जो हमें ना करना चाहिए था?
किस तरफ चलते किस बात की कोशिश करते 'दोस्त' 
मंज़िल ख़ुद वहां डेरा डाले बैठी थी जहाँ पहले हमें होना चाहिए था


मंगलवार, 27 जून 2017

चाय वाली मुहब्बत

अरे सुनो मुझसे मुहब्बत करोगी 
सुनो तो सही 
एक मिनट, एक मिनट बस एक मिनट
मोहब्बत की ही तो बात कर रहा हूँ 
शादी की नहीं 
मोहब्बत में किसी का कुछ नहीं जाता 
शादी में तो तुम्हें पता ही होगा 
ज़िन्दगी दांव पे लगानी पड़ती है 
वो ज़िन्दगी भर का खेल है 
प्यार का क्या है 
मुझे कोई पसंद आयी 
किसी को मैं पसंद आया 
"नमस्ते जी क्या आप मेरे साथ एक कप चाय पिएंगी"
"ठीक है पर पहले एक गिलास पानी" 

देखा आपने
बस इतनी सो बात है 
इसमें क्या डरना 
चाय के दौरान कुछ बातें होंगी ही 
शायद फोन नंबर भी बदले जाएँ 
फिर शायद फोन हो भी जाये 

एक कप चाय, एक कॉफी, एक वडा पाव 
कुछ खाली थोड़ी भरी लोकल ट्रेन
दोनों के बीच एक बिसलरी की बोतल 
बदला बदला सा पानी का स्वाद 
एक जाना अनजाना स्टेशन 
शहर कम गाँव ज़्यादा 
फिर कुछ दूर पर वो मशहूर ढाबा
खाना बढ़िया था 
बिल भी बुरा नहीं था 
"अरे वेटर वो ऊपर होटल भी है क्या"
"साब आप जैसे कई लोग आते हैं न 
वो रुक जाते हैं दो चार घंटे  
कभी कभी सारी रात भी 
उनके लिए"

निगाहें मिलीं एक जोड़ी झुकीं 
एक रुकी रहीं 
एक दबी हलकी सी आवाज़,
अगले हफ्ते आएंगे, आज नहीं 

मैंने कहा था न मुहब्बत कोई टेढ़ी खीर नहीं है 
बल्कि काफी आसान है 

'दोस्त' मुझे तो पीनी है चाय 
आपको नहीं चाहिए तो कोई दिक़्क़त नहीं
हैव ए गुड डे

सोमवार, 26 जून 2017

कहानी, 'की' और 'का' की

का: आओ यहाँ बैठें।
की: यहाँ?
का: क्यों? ये जगह ठीक ना हो तो कहीं और चलते हैं।
की: नहीं नहीं मैं तो यूँ ही कह रही थी।
का: नहीं तुम शायद सही हो, चलो ज़रा उस तरफ देखते हैं।
की: हाँ वहां से झील का नज़ारा ठीक से दिखाई देगा।
का: हाँ चलो।
की: बारिश में कितनी सुन्दर लग रही है न झील ?
का: ठीक कह रही हो।
की: सब कुछ धुल गया है। साफ़ सुथरे पेड़। चमकदार हरे पत्ते।
का: ये, ये जगह ठीक है क्या ?
की: ये? ये जगह तो ठीक है पर देखो गीली तो नहीं है?
का: हाँ, है तो गीली। कपडे ख़राब हो जायेंगे।
की: नहीं बाबा। वो हुआ तो घर में मुश्किल हो जाएगी।
का: अब बारिश के मौसम में सूखी घास तो मिलेगी नहीं।
की: तब तो मैं थक जाउंगी।
का: वो पेड़ है न, वो बड़ा और घना वाला। चलो उसके पीछे चलते हैं।
की: वहां जगह होगी क्या ?
का: जगह का तो पता नहीं पर वो जगह थोड़ी छुपी सी है। है न?
की: छुपी ? तो उससे क्या होगा ?
का: कुछ खास नहीं। वहां हमें कोई देख नहीं सकेगा।
की: अरे, तो वहां क्यों जाएँ ?
का: तुम्हें मेरे साथ अकेले क्यों आना था ?
की: मुझे ये झील देखनी थी और बाइक पर तो दो ही बैठ सकते हैं न।
का: क्या !
की: रुको मैं कुछ फोटो ले लूँ फिर वापस चलेंगे
का: तुम अपना काम कर लो मैं बाइक के पास हूँ।
की: ठीक है मैं दस मिनट में आयी
कैमरे की क्लिक।
बाइक की किक।
कैमरे की क्लिक ...



बुधवार, 10 मई 2017

क़ीमत

क़ीमत 
हर इंसान लगाता है क़ीमत 
हर एक चीज़ की
हर इंसान की 
इसकी, उसकी, घर की, गाड़ी की 
ज़मीन जायदाद की 
यहाँ तक दोस्तों की, मां बाप की
भाई बहनों की 
घर बार की, देश दुनिया की 
दूसरों के विचारों की 
उनकी समझ की, समझदारी की 

... अपनी भी
माफ़ करें 
शायद यहाँ कुछ अटपटा हो गया
उल्टा पल्टा हो गया 
जो पहले आना था वो बाद में आया
क़ीमत खुद की 
यानि एक ऐसी बेशक़ीमती चीज़ की
जिसका खुद की नज़र में 
कोई मोल नहीं हो सकता
खुद पर कोई दाम नहीं लिखा जा सकता 
कोई लिखता भी नहीं 
अगर किसीने लिखा भी, 
तो वो कम या ग़लत होगा  
अपनी नज़र में ज़्यादातर लोग 
कुछ ज़्यादा ही क़ीमती होते हैं 
या यूँ कहिये बेशक़ीमती होते हैं
हालांकि उनके बारे में दूसरों का ख़याल 
कुछ दूसरा ही होता है
ठीक वैसे ही जैसे इनका औरों के बारे में
चलिए ये सब अंदर की बात है 
हर किसीके के मन की बात है 
घर घर की बात है 
फिर भी इस दुनिया में 
ज़्यादातर लोग अपनी क़ीमत को 
अपने दिल ही में छुपाये 
अपने साथ लेकर चले जाते हैं 
दुनिया को पता ही नहीं चल पाता 
कि खुद की नज़र में वो 
कितने मंहगे या सस्ते थे 

पर 'दोस्त' ज़िन्दगी में शायद ही किसीको 
मिलता होगा ऐसा मौक़ा
कि ऐसा कुछ मिल जाये 
या कोई मिल जाये
एक ऐसा बेशक़ीमती नगीना 
एक हीरा, मोती, या शायद एक सितारा
जिसे पा कर आपकी खुद की क़ीमत
आसमान छू ले 
और वो ग़ुम हो जाये
तो आप भी कहीं खो जाएँ 
दो कौड़ी के भी न रह जाएँ

शनिवार, 6 मई 2017

ये दिल ये पागल दिल मेरा

ये दिल मेरा 
सीने में मेरे 
ज़रा इस तरफ 
हाँ यहीं बीच में 
थोड़ा सा इधर 
हाँ बांयें, थोड़ा और 
बस यहीं 
ये दिल मेरा
मेरे सीने के अंदर 
शायद ज़रा टूट गया 
टूट फूट गया
पहले तो ये ला दो 
वो दिला दो 
ये वाला नहीं वो वाला चाहिए 
लाल नहीं पीला 
हरा नहीं नीला 
न ही कभी चैन से बैठा 
न मुझे ही आराम करने दिया  
पर अब 
अब कुछ कहता ही नहीं 
कहीं रूठ तो नहीं गया
हे भगवान  
टूटा फूटा और अब रूठा
ये दिल है या किसीकी दिलरुबा 
जब देखो नखरे 
अरे दिल मेरा है 
और मुझी से नाराज़ रहता है 
सीने में जगह हथिया ली है
और सारा कारोबार समेट लिया 
अब मैं अपने दिमाग़ को लेकर कहाँ जाऊं 
इसकी तो कोई क़द्र ही नहीं करता 
कोई नहीं पूछता 
सब कहते हैं दिल का अच्छा है
वरना बेवकूफ है
हद्द हो गयी जनाब
न सोचा न समझा
और सर पे बेवकूफ का ताज रख दिया 
आपकी इसी बात ने तो दिल तोड़ दिया 
जी यही ... 
दोस्त, ये दिल मेरा 
मेरे सीने के अंदर 
शायद ज़रा टूट गया है 
टूट फूट गया है ...  

मंगलवार, 2 मई 2017

कहीं ये वो तो नहीं

इतना अँधेरा !
क्यों हैं इतना अँधेरा 
और कोई क्यों नहीं दिखाई देता 
क्या इस दुनिया में सिर्फ मैं ही बचा हूँ 
बाकी दुनिया कहाँ है 
दुनिया वाले कहाँ हैं 
वो सब लोग ... 
क्या कोई बम फट गया 
या कोई भयानक आग लग गयी 
पर ... इस अँधेरे में आग भी नज़र नहीं आ रही 
धुआं ... वो भी नहीं 
ये ... ये क्या जगह है 
कौन सा शहर है 
ये सड़क है या कोई वीराना 
किसीका कोई घर 
इंसान की कोई आवाज़
कोई हरकत किसी पेड़ की 
हवा का कोई झोंका 
उफ़ ... अब मैं इस दुनिया में अकेला ही हूँ 

एका-एक घुप्प अँधेरे में 
अँधेरे का ही एक टुकड़ा हिला 
... ज़रा सा
और उस अंधेरे से निकल कर 
मेरी ही डगर की तरफ आने लगा 
... ओह तो मेरे जैसा एक और भी है 
मैंने सोचा चलो कोई तो मिला 
पर मन में डर भी था 
पता नहीं कौन ...
दोस्त या कोई और 
पर उस अँधेरे के टुकड़े ने दुश्मन जैसी कोई हरकत नहीं की 
वो बेहद आहिस्ता से कुछ नज़दीक आया 
फिर रुक गया 
फिर चला फिर रुक गया 
फिर चला ...
इस रुकने चलने में हमारी दूरी काफी कम हो गयी 
मुझे लगा ये दोस्त हो न हो 
दुश्मन तो बिल्कुल नहीं है 
धीरे धीरे वो साया मेरे पीछे आ गया 
मैं ज़रा हिचकिचाया फिर रुक ही गया 
मेरे कंधे पर एक हाथ आया 
मैं मुड़ न सका 
दो तरह के डर मन में भरे हुए थे 
दोनों ही हालातों में दिल को संभालना मुश्किल होगा
...एक ये कोई अनजाना दुश्मन न हो  
या वो दोस्त सारी उम्र जिसका इंतज़ार किया

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

आसान मुश्किलें

मुश्किलेँ ?
मुश्किलें है तो क्या हुआ
ये नामुमकिन तो नहीं हैं
जब से मैंने इनको तव्वजुह देना बंद कर दिया
ये मेरे आगे पीछे घूमने लगीं
मैंने फिर भी हवा न दी
अरे भाई जब इंसान का काम आसानी से चल जाता है
तो मुश्किलों की क्या ज़रुरत है
तो जनाब मेरे इन नए तेवरों से
मुश्किलों की शक्ल उड़ी उड़ी लगने लगी है
घबरा सी गयी लगती हैं
ख़ैर बहुत परेशान कर लिया इन्होनें मुझे
इन्हें अपने पर कुछ ज़्यादा ही घमंड हो गया था
और घमंड तो एक दिन टूटना ही था
ये हमेशा ही टूटता है
सही वक़्त आ जाये तो किसी भी मुश्किल का घमंड
आसानी से टूट जाता है


शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

शोर और शांति

कितना शोर है चारों तरफ़ 
कितनी हलचल 
सड़क दिखती है मेरी खिड़की से 
कारें टेम्पो ऑटो स्कूटरों की आवाज़ें 
और उनके हॉर्न 
बीच में सड़क पार करने की कोशिश में 
कुछ बूढ़े औरतें बच्चे 
दुम दबाये बिदकते कुत्ते 
कितनी परेशानियों में है हर कोई 
कोई यहाँ से वहां जाना चाहता है 
तो किसीको उस तरफ से, इधर आना है 
कई इस शोर में फोन को कान पर दबाये हैं 
भागे जा रहे हैं 
कुछ कहने की कोशिश में 
या कुछ सुनने की ख्वाहिश में

कुछ देर में मन भारी हो गया 
खिड़की के बाहर अगर इतनी ऊर्जा है 
तो पूरे शहर में क्या होगा 
और दुनिया में... ?
मैं अंदर गया 
खिड़की भी बंद कर दी 
आवाज़ें ज़रूर काम हो गयीं 
पर मन पर जम चुका था 
उस छोटी सी सड़क की 
परशानियों का बोझ

मुझे समुद्र की याद गयी 
समुद्र मुझे बेहद पसंद है 
उसकी लहरों में भी कितनी ताक़त होती है 
कितनी दृढ़ता 
वो कभी रुकती नहीं 
एक लहर शोर मचाती किनारे से टकराती है 
तो उसके पीछे दूसरी 
फिर एक और, फिर और एक
एक एक कर के  
अनगिनत लहरें एक सा शोर मचातीं
अपने अपने किनारे पा जाती हैं
पता नहीं कितनी लहरें हैं समुद्र में 
और कहाँ छुपी बैठी हैं 
पर आपको अंदर की बात बताऊँ  
लहरों को देखने से मेरा मन शांत हो जाता है 
क्योंकि इनका शोर और इनकी उर्जा अलग है 
मेरी आँखें बंद होने लगीं थीं
पलकें भारी होने लगीं 
धीरे धीरे मन लहरों के नीचे चला गया 
नीचे झाँका तो अथाह गहराई नज़र आयी 
अब लहरें ऊपर से जा रही थीं 
उनका शोर काम हो गया था 
लगा जैसे यहाँ भी खिड़की बंद हो गयी हो 
नीचे की दुनिया अलग थी 
बिलकुल अलग 
मैं और नीचे गया 
थोड़ा और नीचे 
और भी थोड़ा 
लगने लगा जैसे स्वर्ग गया हो 
वहाँ सब कुछ बिलकुल धीमे चल रहा था 
एक नन्हा सा शंख रेंग रहा था 
पता नहीं उसे कहीं जाना भी था या नहीं 
कुछ छोटी बड़ी मछलियां बिना ध्येय के रेंग रही थीं 
इधर उधर 
जैसे शाम को टहलने निकली हों 
किसीको कोई जल्दी नहीं 
किसीसे मिलना नहीं 
कहीं जाना नहीं
कुछ पूछना नहीं 
कुछ कहना नहीं 
कोई समस्या नहीं 
ऊपर की दुनिया में क्या हो रहा है 
वहां कितना शोर है 
कितनी परेशानियां हैं 
किसी को कुछ पता नहीं


एक ख्वाहिश ऐसी

हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी, ऐसी ऐसी, ऐसी ऐसी कि पूछो मत कैसी कैसी बेहद अजीब हों जैसी बिल्कुल नामुमकिन हों वैसी कभी कभी तो  मुझे  लगता है  मैंने कह...