बुधवार, 19 अप्रैल 2017

आसान मुश्किलें

मुश्किलेँ ?
मुश्किलें है तो क्या हुआ 
ये नामुमकिन तो नहीं हैं 
जब से मैंने इनको तव्वजुह देना बंद कर दिया 
ये मेरे आगे पीछे घूमने लगीं
मैंने फिर भी हवा न दी 
अरे भाई जब इंसान का काम आसानी से चल जाता है 
तो मुश्किलों की क्या ज़रुरत है
तो जनाब मेरे इन नए तेवरों से 
मुश्किलों की शक्ल उड़ी उड़ी लगने लगी है
घबरा सी गयी लगती हैं
ख़ैर बहुत परेशान कर लिया इन्होनें मुझे
इन्हें अपने पर कुछ ज़्यादा ही घमंड हो गया था 
और घमंड तो एक दिन टूटना ही था 
ये हमेशा ही टूटता है 
सही वक़्त आ जाये तो किसी भी मुश्किल का घमंड 
आसानी से टूट जाता है

शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

शोर और शांति

कितना शोर है चारों तरफ़ 
कितनी हलचल 
सड़क दिखती है मेरी खिड़की से 
कारें टेम्पो ऑटो स्कूटरों की आवाज़ें 
और उनके हॉर्न 
बीच में सड़क पार करने की कोशिश में 
कुछ बूढ़े औरतें बच्चे 
दुम दबाये बिदकते कुत्ते 
कितनी परेशानियों में है हर कोई 
कोई यहाँ से वहां जाना चाहता है 
तो किसीको उस तरफ से, इधर आना है 
कई इस शोर में फोन को कान पर दबाये हैं 
भागे जा रहे हैं 
कुछ कहने की कोशिश में 
या कुछ सुनने की ख्वाहिश में

कुछ देर में मन भारी हो गया 
खिड़की के बाहर अगर इतनी ऊर्जा है 
तो पूरे शहर में क्या होगा 
और दुनिया में... ?
मैं अंदर गया 
खिड़की भी बंद कर दी 
आवाज़ें ज़रूर काम हो गयीं 
पर मन पर जम चुका था 
उस छोटी सी सड़क की 
परशानियों का बोझ

मुझे समुद्र की याद गयी 
समुद्र मुझे बेहद पसंद है 
उसकी लहरों में भी कितनी ताक़त होती है 
कितनी दृढ़ता 
वो कभी रुकती नहीं 
एक लहर शोर मचाती किनारे से टकराती है 
तो उसके पीछे दूसरी 
फिर एक और, फिर और एक
एक एक कर के  
अनगिनत लहरें एक सा शोर मचातीं
अपने अपने किनारे पा जाती हैं
पता नहीं कितनी लहरें हैं समुद्र में 
और कहाँ छुपी बैठी हैं 
पर आपको अंदर की बात बताऊँ  
लहरों को देखने से मेरा मन शांत हो जाता है 
क्योंकि इनका शोर और इनकी उर्जा अलग है 
मेरी आँखें बंद होने लगीं थीं
पलकें भारी होने लगीं 
धीरे धीरे मन लहरों के नीचे चला गया 
नीचे झाँका तो अथाह गहराई नज़र आयी 
अब लहरें ऊपर से जा रही थीं 
उनका शोर काम हो गया था 
लगा जैसे यहाँ भी खिड़की बंद हो गयी हो 
नीचे की दुनिया अलग थी 
बिलकुल अलग 
मैं और नीचे गया 
थोड़ा और नीचे 
और भी थोड़ा 
लगने लगा जैसे स्वर्ग गया हो 
वहाँ सब कुछ बिलकुल धीमे चल रहा था 
एक नन्हा सा शंख रेंग रहा था 
पता नहीं उसे कहीं जाना भी था या नहीं 
कुछ छोटी बड़ी मछलियां बिना ध्येय के रेंग रही थीं 
इधर उधर 
जैसे शाम को टहलने निकली हों 
किसीको कोई जल्दी नहीं 
किसीसे मिलना नहीं 
कहीं जाना नहीं
कुछ पूछना नहीं 
कुछ कहना नहीं 
कोई समस्या नहीं 
ऊपर की दुनिया में क्या हो रहा है 
वहां कितना शोर है 
कितनी परेशानियां हैं 
किसी को कुछ पता नहीं


कहानी, एक पुरानी

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