बुधवार, 10 मई 2017

क़ीमत

क़ीमत 
हर इंसान लगाता है क़ीमत 
हर एक चीज़ की
हर इंसान की 
इसकी, उसकी, घर की, गाड़ी की 
ज़मीन जायदाद की 
यहाँ तक दोस्तों की, मां बाप की
भाई बहनों की 
घर बार की, देश दुनिया की 
दूसरों के विचारों की 
उनकी समझ की, समझदारी की 

... अपनी भी
माफ़ करें 
शायद यहाँ कुछ अटपटा हो गया
उल्टा पल्टा हो गया 
जो पहले आना था वो बाद में आया
क़ीमत खुद की 
यानि एक ऐसी बेशक़ीमती चीज़ की
जिसका खुद की नज़र में 
कोई मोल नहीं हो सकता
खुद पर कोई दाम नहीं लिखा जा सकता 
कोई लिखता भी नहीं 
अगर किसीने लिखा भी, 
तो वो कम या ग़लत होगा  
अपनी नज़र में ज़्यादातर लोग 
कुछ ज़्यादा ही क़ीमती होते हैं 
या यूँ कहिये बेशक़ीमती होते हैं
हालांकि उनके बारे में दूसरों का ख़याल 
कुछ दूसरा ही होता है
ठीक वैसे ही जैसे इनका औरों के बारे में
चलिए ये सब अंदर की बात है 
हर किसीके के मन की बात है 
घर घर की बात है 
फिर भी इस दुनिया में 
ज़्यादातर लोग अपनी क़ीमत को 
अपने दिल ही में छुपाये 
अपने साथ लेकर चले जाते हैं 
दुनिया को पता ही नहीं चल पाता 
कि खुद की नज़र में वो 
कितने मंहगे या सस्ते थे 

पर 'दोस्त' ज़िन्दगी में शायद ही किसीको 
मिलता होगा ऐसा मौक़ा
कि ऐसा कुछ मिल जाये 
या कोई मिल जाये
एक ऐसा बेशक़ीमती नगीना 
एक हीरा, मोती, या शायद एक सितारा
जिसे पा कर आपकी खुद की क़ीमत
आसमान छू ले 
और वो ग़ुम हो जाये
तो आप भी कहीं खो जाएँ 
दो कौड़ी के भी न रह जाएँ

शनिवार, 6 मई 2017

ये दिल ये पागल दिल मेरा

ये दिल मेरा 
सीने में मेरे 
ज़रा इस तरफ 
हाँ यहीं बीच में 
थोड़ा सा इधर 
हाँ बांयें, थोड़ा और 
बस यहीं 
ये दिल मेरा
मेरे सीने के अंदर 
शायद ज़रा टूट गया 
टूट फूट गया
पहले तो ये ला दो 
वो दिला दो 
ये वाला नहीं वो वाला चाहिए 
लाल नहीं पीला 
हरा नहीं नीला 
न ही कभी चैन से बैठा 
न मुझे ही आराम करने दिया  
पर अब 
अब कुछ कहता ही नहीं 
कहीं रूठ तो नहीं गया
हे भगवान  
टूटा फूटा और अब रूठा
ये दिल है या किसीकी दिलरुबा 
जब देखो नखरे 
अरे दिल मेरा है 
और मुझी से नाराज़ रहता है 
सीने में जगह हथिया ली है
और सारा कारोबार समेट लिया 
अब मैं अपने दिमाग़ को लेकर कहाँ जाऊं 
इसकी तो कोई क़द्र ही नहीं करता 
कोई नहीं पूछता 
सब कहते हैं दिल का अच्छा है
वरना बेवकूफ है
हद्द हो गयी जनाब
न सोचा न समझा
और सर पे बेवकूफ का ताज रख दिया 
आपकी इसी बात ने तो दिल तोड़ दिया 
जी यही ... 
दोस्त, ये दिल मेरा 
मेरे सीने के अंदर 
शायद ज़रा टूट गया है 
टूट फूट गया है ...  

मंगलवार, 2 मई 2017

कहीं ये वो तो नहीं

इतना अँधेरा !
क्यों हैं इतना अँधेरा 
और कोई क्यों नहीं दिखाई देता 
क्या इस दुनिया में सिर्फ मैं ही बचा हूँ 
बाकी दुनिया कहाँ है 
दुनिया वाले कहाँ हैं 
वो सब लोग ... 
क्या कोई बम फट गया 
या कोई भयानक आग लग गयी 
पर ... इस अँधेरे में आग भी नज़र नहीं आ रही 
धुआं ... वो भी नहीं 
ये ... ये क्या जगह है 
कौन सा शहर है 
ये सड़क है या कोई वीराना 
किसीका कोई घर 
इंसान की कोई आवाज़
कोई हरकत किसी पेड़ की 
हवा का कोई झोंका 
उफ़ ... अब मैं इस दुनिया में अकेला ही हूँ 

एका-एक घुप्प अँधेरे में 
अँधेरे का ही एक टुकड़ा हिला 
... ज़रा सा
और उस अंधेरे से निकल कर 
मेरी ही डगर की तरफ आने लगा 
... ओह तो मेरे जैसा एक और भी है 
मैंने सोचा चलो कोई तो मिला 
पर मन में डर भी था 
पता नहीं कौन ...
दोस्त या कोई और 
पर उस अँधेरे के टुकड़े ने दुश्मन जैसी कोई हरकत नहीं की 
वो बेहद आहिस्ता से कुछ नज़दीक आया 
फिर रुक गया 
फिर चला फिर रुक गया 
फिर चला ...
इस रुकने चलने में हमारी दूरी काफी कम हो गयी 
मुझे लगा ये दोस्त हो न हो 
दुश्मन तो बिल्कुल नहीं है 
धीरे धीरे वो साया मेरे पीछे आ गया 
मैं ज़रा हिचकिचाया फिर रुक ही गया 
मेरे कंधे पर एक हाथ आया 
मैं मुड़ न सका 
दो तरह के डर मन में भरे हुए थे 
दोनों ही हालातों में दिल को संभालना मुश्किल होगा
...एक ये कोई अनजाना दुश्मन न हो  
या वो दोस्त सारी उम्र जिसका इंतज़ार किया

कहानी, एक पुरानी

 नमस्कार महोदय नमस्कार, जी आप... कौन? पहचाना नहीं मैंने।  जी मैं एक दूत हूँ। नदी के तट पर जो धर्मशाला है वहां से आया हूँ।  इतनी दूर से? जी क...