मंगलवार, 27 जून 2017

चाय वाली मुहब्बत

अरे सुनो मुझसे मुहब्बत करोगी 
सुनो तो सही 
एक मिनट, एक मिनट बस एक मिनट
मोहब्बत की ही तो बात कर रहा हूँ 
शादी की नहीं 
मोहब्बत में किसी का कुछ नहीं जाता 
शादी में तो तुम्हें पता ही होगा 
ज़िन्दगी दांव पे लगानी पड़ती है 
वो ज़िन्दगी भर का खेल है 
प्यार का क्या है 
मुझे कोई पसंद आयी 
किसी को मैं पसंद आया 
"नमस्ते जी क्या आप मेरे साथ एक कप चाय पिएंगी"
"ठीक है पर पहले एक गिलास पानी" 

देखा आपने
बस इतनी सो बात है 
इसमें क्या डरना 
चाय के दौरान कुछ बातें होंगी ही 
शायद फोन नंबर भी बदले जाएँ 
फिर शायद फोन हो भी जाये 

एक कप चाय, एक कॉफी, एक वडा पाव 
कुछ खाली थोड़ी भरी लोकल ट्रेन
दोनों के बीच एक बिसलरी की बोतल 
बदला बदला सा पानी का स्वाद 
एक जाना अनजाना स्टेशन 
शहर कम गाँव ज़्यादा 
फिर कुछ दूर पर वो मशहूर ढाबा
खाना बढ़िया था 
बिल भी बुरा नहीं था 
"अरे वेटर वो ऊपर होटल भी है क्या"
"साब आप जैसे कई लोग आते हैं न 
वो रुक जाते हैं दो चार घंटे  
कभी कभी सारी रात भी 
उनके लिए"

निगाहें मिलीं एक जोड़ी झुकीं 
एक रुकी रहीं 
एक दबी हलकी सी आवाज़,
अगले हफ्ते आएंगे, आज नहीं 

मैंने कहा था न मुहब्बत कोई टेढ़ी खीर नहीं है 
बल्कि काफी आसान है 

'दोस्त' मुझे तो पीनी है चाय 
आपको नहीं चाहिए तो कोई दिक़्क़त नहीं
हैव ए गुड डे

सोमवार, 26 जून 2017

कहानी, 'की' और 'का' की

का: आओ यहाँ बैठें।
की: यहाँ?
का: क्यों? ये जगह ठीक ना हो तो कहीं और चलते हैं।
की: नहीं नहीं मैं तो यूँ ही कह रही थी।
का: नहीं तुम शायद सही हो, चलो ज़रा उस तरफ देखते हैं।
की: हाँ वहां से झील का नज़ारा ठीक से दिखाई देगा।
का: हाँ चलो।
की: बारिश में कितनी सुन्दर लग रही है न झील ?
का: ठीक कह रही हो।
की: सब कुछ धुल गया है। साफ़ सुथरे पेड़। चमकदार हरे पत्ते।
का: ये, ये जगह ठीक है क्या ?
की: ये? ये जगह तो ठीक है पर देखो गीली तो नहीं है?
का: हाँ, है तो गीली। कपडे ख़राब हो जायेंगे।
की: नहीं बाबा। वो हुआ तो घर में मुश्किल हो जाएगी।
का: अब बारिश के मौसम में सूखी घास तो मिलेगी नहीं।
की: तब तो मैं थक जाउंगी।
का: वो पेड़ है न, वो बड़ा और घना वाला। चलो उसके पीछे चलते हैं।
की: वहां जगह होगी क्या ?
का: जगह का तो पता नहीं पर वो जगह थोड़ी छुपी सी है। है न?
की: छुपी ? तो उससे क्या होगा ?
का: कुछ खास नहीं। वहां हमें कोई देख नहीं सकेगा।
की: अरे, तो वहां क्यों जाएँ ?
का: तुम्हें मेरे साथ अकेले क्यों आना था ?
की: मुझे ये झील देखनी थी और बाइक पर तो दो ही बैठ सकते हैं न।
का: क्या !
की: रुको मैं कुछ फोटो ले लूँ फिर वापस चलेंगे
का: तुम अपना काम कर लो मैं बाइक के पास हूँ।
की: ठीक है मैं दस मिनट में आयी
कैमरे की क्लिक।
बाइक की किक।
कैमरे की क्लिक ...



परेशां बुत

एक उम्र बिता कर सारे रिश्ते भुला कर अपना पराया गँवा कर ज़िन्दगी आ गयी है ऐसे मक़ाम पे जहाँ न सुकून है न दर्द है कभी सुकून है तो दर्द भी है दो...