सोमवार, 26 जून 2017

कहानी, 'की' और 'का' की

का: आओ यहाँ बैठें।
की: यहाँ?
का: क्यों? ये जगह ठीक ना हो तो कहीं और चलते हैं।
की: नहीं नहीं मैं तो यूँ ही कह रही थी।
का: नहीं तुम शायद सही हो, चलो ज़रा उस तरफ देखते हैं।
की: हाँ वहां से झील का नज़ारा ठीक से दिखाई देगा।
का: हाँ चलो।
की: बारिश में कितनी सुन्दर लग रही है न झील ?
का: ठीक कह रही हो।
की: सब कुछ धुल गया है। साफ़ सुथरे पेड़। चमकदार हरे पत्ते।
का: ये, ये जगह ठीक है क्या ?
की: ये? ये जगह तो ठीक है पर देखो गीली तो नहीं है?
का: हाँ, है तो गीली। कपडे ख़राब हो जायेंगे।
की: नहीं बाबा। वो हुआ तो घर में मुश्किल हो जाएगी।
का: अब बारिश के मौसम में सूखी घास तो मिलेगी नहीं।
की: तब तो मैं थक जाउंगी।
का: वो पेड़ है न, वो बड़ा और घना वाला। चलो उसके पीछे चलते हैं।
की: वहां जगह होगी क्या ?
का: जगह का तो पता नहीं पर वो जगह थोड़ी छुपी सी है। है न?
की: छुपी ? तो उससे क्या होगा ?
का: कुछ खास नहीं। वहां हमें कोई देख नहीं सकेगा।
की: अरे, तो वहां क्यों जाएँ ?
का: तुम्हें मेरे साथ अकेले क्यों आना था ?
की: मुझे ये झील देखनी थी और बाइक पर तो दो ही बैठ सकते हैं न।
का: क्या !
की: रुको मैं कुछ फोटो ले लूँ फिर वापस चलेंगे
का: तुम अपना काम कर लो मैं बाइक के पास हूँ।
की: ठीक है मैं दस मिनट में आयी
कैमरे की क्लिक।
बाइक की किक।
कैमरे की क्लिक ...



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