मंगलवार, 25 जुलाई 2017

कुछ भी

फिर, फिर क्या हुआ
फिर? फिर क्या होना था
क्या होना था? अरे मगर हुआ क्या
तू भी यार, अरे वही जो होना था,
मतलब?
मतलब कुछ खास नहीं
हे भगवान!
क्यों इतनी भक्ति में डूब गया?
अबे भक्ति छोड तू अपने इस व्यक्तवय का मतलब ज़रा समझायेगा मुझे
व्यक्तवय ? अरे दो शब्द व्यक्तवय हो जाते हैं क्या?
अबे उल्लू के पट्ठे मैंने पूछा था की उस दिन क्या हुआ था
ये लो। अब ये कौन से दिन की बात है?
एक मिनट, रुक ज़रा
ले रुक गया
तेरे घर में थोड़ी दारू है?
'दारू'? अबे पगला गया है? दोपहर के तीन बजे हैं। दारू!
इजाज़त हो तो आपकी तारीफ़ में कुछ कहना है
इरशाद, ज़रूर कहिये
ग़ौर फरमाएं, तेरे जैसे बन्दे से सर खपाना हो
तेरे जैसे बन्दे से ग़र सर खपाना हो
तो 'दोस्त' सुबह चार बजे भी पीनी पड़ सकती है... मुक़र्रर ? नहीं ?
अरे यार तू तो वाकई बड़ा परेशान लग रहा है आज
नहीं नहीं परेशानी कैसी, मैं तो बस ऐसे ही
आज कोई और मुद्दा नहीं है तेरे पास?
अच्छा सुन
चल सुना
तूने किसी जासूसी दफ्तर में नौकरी कर ली है क्या
क्यों, तुझे कैसे पता चला
तू किसी बात का सीधा जवाब ही नहीं दे रहा

कट, बस। बढ़िया हुआ। अगले हफ़्ते दोनों टाइम पर आ जाना ।



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