सोमवार, 4 जून 2018

ग़ालिब और मैं

ये न थी हमारी क़िस्मत, के विसाले यार होता
शुक्र है वो न ही पहुंचे, वरना हम पर इलज़ाम होता

तेरे वादे पर जिए हम, तो ये जान झूठ जाना
तुम पर भी भरोसा होता, ग़र औरों पे किया होता

कोई मेरे दिल से पूछे, तेरे तीर-ए-नीमकश को
धरा रह जाता तीर तेरा, अगर मेरा निकल गया होता

कहूँ किससे मैं की क्या है शब-ए-ग़म बुरी बला है
ग़र दिन में विसाल होता, तो ज़िक्र-ए-शब-ए-ग़म न होता

ये मसाइले तसव्वुफ़ ये तेरा बयान 'ग़ालिब'
तुझे हम 'दोस्त' समझते जो न हरजाई होता



परेशां बुत

एक उम्र बिता कर सारे रिश्ते भुला कर अपना पराया गँवा कर ज़िन्दगी आ गयी है ऐसे मक़ाम पे जहाँ न सुकून है न दर्द है कभी सुकून है तो दर्द भी है दो...