बुधवार, 31 अक्तूबर 2018

ग़ज़ल और हार

सोचता हूँ चंद शेर कहूँ 
चंद... से मक़सद है कि
कम से कम इतने तो हो जाएं 
कि एक ग़ज़ल की माला अपने गले में पड़ जाये 
चलो ग़ज़लों की रवानगी न हो सके, न सही
एक नज़्म की नज़ाक़त ही हाथ लग जाये 

चलिए पहले मुद्दा तो ढूंढ लें 
जनाब शायद आप मतले की बात कर रहे हैं 
मुआफ करें क़िबला... आपने सही फ़रमाया 
मतला, मतला --
ख़ैर तो एक बार फिर 
काम आएगी ज़िन्दगी,
ज़िन्दगी जो मक़्ते तक पहुँच गयी है
कितना कुछ है इसके दामन में 
इश्क़, जुदाई, मिलन, खुशियां
हसरतें, लालच, चोटें, सुबकियां 
कुछ सख़्त हिदायतें, चंद ट्रॉफियां
और भी बहुत कुछ... 
अब कोशिश शुरू की जाये 
तो जनाब मुलाहज़ा हो जाए -- 

वो कल मिले और आज बिछड़ गए 
वो कल मिले और आज बिछड़ गए 

पर मैंने मुक़र्रर तो सुना ही नहीं 
जी शायद सुनाई नहीं दिया होगा  
यहाँ शोर भी बहुत है 
है ना 
ख़ैर ग़ौर फरमाएं 

वो कल मिले और आज बिछड़ गए  
इतनी जल्दी जनाब के तेवर बदल गए 

शुक्रिया शुक्रिया... आदाब

वो कल मिले और आज बिछड़ गए  
इतनी जल्दी जनाब के तेवर बदल गए 
अरमानों पर मेरे बादल घिर आये 
मुझसे क्या ग़लत हुआ कोई बतलाये 
ये बिला वजह था, यही कह जाये 
जो अब तक न हुआ वो हो जाये 
कोई नयी नवेली ही घट जाये 
पुराना सब कुछ दफ़्न हो जाये 
अच्छे वक़्त का बीज जम जाये 
और बुरे दिनों पर मिट्टी पड़ जाये --

जी अब ज़रा सोचने के लिए वक़्फ़ा --
म्यां ज़रा वो पानी का प्याला इधर सरकाना 
शायद इसीको पानी मांगना कहते होंगे 

ग़र कुछ देर और ये सिलसिले चल जाते  
'दोस्त' इनमें कुछ और शेर जुड़ जाते 
हमने ग़ज़लों के पैगम्बर का क्या बिगाड़ा था 
हार नहीं मांगीग़ज़ल का हार माँगा था। 

अगर आपको पसंद न आई तो क़ुसूर आपका नहीं है

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