सोमवार, 17 मई 2021

परेशां बुत

एक उम्र बिता कर
सारे रिश्ते भुला कर
अपना पराया गँवा कर
ज़िन्दगी आ गयी है
ऐसे मक़ाम पे
जहाँ न सुकून है न दर्द है
कभी सुकून है तो दर्द भी है
दोनों साथ साथ हैं
फर्क मिट गया है दोनों के बीच का
कभी सुकून दर्द 
की वजह होता है
तो कभी दर्द में सुकून 
छुपा होता है

सूरज ढ़लता और चढ़ता साथ साथ
सुबह और शाम साथ साथ
ख़बर नहीं कि वक़्त चल रहा है
या थमा हुआ है

मैं कहीं जा रहा था
या आ रहा था
या ऐसा कुछ हुआ ही नहीं
मैं कहीं गया ही नहीं
कहीं जाने वाला ही नहीं था
आना जाना सिर्फ एक ख़याल था
हर एक शख्स बुत बना हुआ था
भागने के अंदाज़ में
वक़्त थमा हुआ था
क़लम रुकी हुई थी
लफ़्ज़ों के इंतज़ार में

शनिवार, 15 मई 2021

कुछ खास नहीं

अरे! क्या हाल है दोस्त ?

बस, कुछ खास नहीं

किधर चले?

बस कहीं नहीं, यूँ ही

और कोई नयी ताज़ी ?

नहीं नहीं, कुछ खास नहीं

अच्छा ये हाथ पे  क्या हुआ

कुछ नहीं, ऐसे ही?

ये तो जले का निशान लगता है

हाँ असल में वो...

क्या घर में पकोड़े बना रहे थे?

नहीं नहीं, बस ऐसे ही

उफ़, तेल काफी गरम रहा होगा

असल में... आग से जला है

आग! कैसी आग?

चिंगारी

चिंगारी? घर में? आग लग गयी थी क्या?

नहीं, असल में पिता जी के दाह संस्कार में एक...

क्या! तुम्हारे फादर गुज़र गए ?

हाँ... वो तीन दिन हुए

ओहो तो ये निशान चिता की आग से?

हाँ वहीं से, मुझे ही करना था सब कुछ

सॉरी यार... तो क्या बीमार थे ?

नहीं... सिर्फ बूढ़े थे, नब्बे साल के

अरे वाह तब तो पूरी ज़िन्दगी जी लिए ऐसा कह सकते हैं

हाँ, कह भी सकते हैं

बीमार रहे? आखीर में?

नहीं कुछ खास नहीं, सिर्फ एक महीना

वाह वाह, जीना हो तो ऐसा

हाँ शायद 

अम्म, शायद उनको मिस कर रहे होगे?

हम्म... अभी तो कुछ खास नहीं

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

मैं: तब और अब

जहाँ जहाँ जाना था हो आए हैं
जिन जिन से मिलना था मिल आये हैं
अब आ गए हैं अपने घर दोस्त
ख़ुद से गुफ़्तगू के लिए
तो बैठ गए हम अपने सामने
आमने सामने
और कस ली है कमर
दोनों ने
हिसाब किताब के लिए
बचपन से अब तक क्या मिला
कितना मिला
उसको मैंने कितना बढ़ाया
गंवाया, कितना बनाया
कितना संवारा, निखारा

पर बचपन में क्या मिला ?
बचपन तक तो मिला नहीं
बचपन में बच्चे कैसे सोचते हैं
क्या करते हैं
क्या उनकी कोई इच्छा होती है
कितना दौड़ते भागते हैं
कूद फांद करते हैं
पार्क में, झूलों पर
अनजाने दोस्तों के बीच
अनजानी खुशियों में डूबे
क्या वो सब था कहीं?
मुझे तो सिर्फ याद है
यहाँ बैठ जाओ
ये खा लो, इसको हाथ मत लगाओ
देखो टूट न जाये

अगर हर चीज़ से डरना पड़ा
सुन्दर चीज़ों से दूर रहना पड़ा
तो मुझे क्या मिला
डर ? और लालच ?
डर और लालच का मैं क्या बना सकता था
ज़्यादा डर और ज़्यादा लालच ?
शायद यही
या तुम्हारे पास कोई दूसरा तर्क है ?
नहीं ना
अजीब बात है
मैंने कई लोगों को ये कहते सुना था
ये बच्चा बड़ा बुद्धिमान है
चार साल की आयु में पूरी हनुमान चालीसा याद कर ली !
और भी बहुत कुछ...
चलो आगे बढ़ते हैं
कॉलेज की बात करें

नहीं, रुको
पहले ये देखो की आज तुम्हारे पास क्या क्या है
कई मज़बूत चीज़ें हैं
घर है नाम है परिवार है
हुनर है ..

एक मिनट
पर ये सब मुझे दिया किसने
तुमने ? बिलकुल नहीं
ये सब मेरी मेहनत, बुद्धिमत्ता और लगन का नतीजा है
मेरे साथ कोई नहीं था
पहले तो जनाब
ये सारे इरादे मैंने अपने अंदर पैदा किये
और फिर उन इरादों को इन तमाम चीज़ों में तबदील किया
किसी को कुछ पता नहीं था
कि मैं क्या चाहता हूँ
क्या सोच रहा हूँ

मन में कुछ है भी या बस सर झुकाये काम किये जा रहा हूँ
मैं बिलकुल अकेला था
जब मेरे अंदर लगातार ये सारा मंथन चल रहा था
बरसों तक मंथन, मंथन, मंथन
फिर उस मंथन से धीरे धीरे सुनहरी चीज़ें बाहर आने लगीं
धीरे धीरे उन सुंदर चीज़ों से एक नयी दुनिया बनने लगी

तुम्हें मालूम था की वो सब क्या हो रहा था
तुम तो ऐसी बात सोच भी नहीं सकते थे
सब बकवास, यही ना
बचपन का वो डर अब विश्वास में ढल चुका था
मैंने अपने विश्वास के सहारे
नए लोग ढूंढे
सुन्दर, प्यारे, निश्चिन्त
जिनके चेहरे पर मुस्कान रहती थी
तनाव नहीं
ये समझ लो कि नए रिश्ते बनाये
जल्द ही वो सब जो मुझे बचपन में मिलना चाहिए था
मैंने जवानी में हासिल किया
दोस्ती स्नेह आत्मविश्वास और भी बहुत कुछ
खुद, अकेले
मैं शायद फिर से बच्चा बन रहा था

पर तुम्हें मेरी ये सफलता फूटी आँखों नहीं भाई
तुम्हारी सोच इतनी पुरानी है
कि तुम्हें सोचना ही नहीं चाहिए
कुछ भी नहीं
सोचना तुम्हारा काम नहीं है
लोग बाहर जा कर काम करते हैं
नाम कमाते हैं धन अर्जित करते हैं
दोस्त बनाते हैं
ये सब तुम्हारे बस का नहीं है
तुम्हें तो बस दिमाग लगाए बग़ैर ही जैसे मिलता रहा है
वैसे ही मिलता रहे...
तुमने कोल्हू देखा है?
मैंने देखा है
एक बैल छोटी सी अँधेरी कोठरी में चक्कर लगाता रहता है
घूमता रहता है,
गोल गोल गोल
उसको पता ही नहीं होता कि वो सरसों का तेल निकाल रहा है
सरसों कितनी बड़ी होती है पता है ?
इतनी सी होती है
तुम वैसे ही हो कोल्हू के उस बैल जैसे
पहली बात तो तुम कुछ नया कर ही नहीं सकते
अगर कुछ कर भी रहे हो तो तुम्हें पता ही नहीं होगा
कि तुमने कुछ किया भी है
दुःखद

ख़ैर ठीक है मैं वापस ज़रूर आया हूँ
पर वापस आ नहीं गया हूँ
मैं वापस बहार जाने के लिए ही आया हूँ
तुम्हारे साथ मेरा दम घुटता है
मुझे बाहर के बुद्धिमान दुश्मन मंज़ूर हैं
पर घर में छुपे सुरक्षित बेअक्ल दोस्त नहीं

मंगलवार, 23 मार्च 2021

एक बिचारा असंभव विचार

आप सब लोग आये
बेहद ख़ुशी हुई
इतने सारे जान पहचान के लोग एक साथ !
पर क्षमा करें
मैं आपके स्वागत में उठ नहीं सकता
हाथ नहीं मिला सकता
नमस्कार नहीं कर सकता
चलिए छोड़िए इस मुद्दे को
जी आप यहाँ इस तरफ की कुर्सी पर बैठ जाइये
और आप उस तरफ ... दरी पर जगह है
बच्चे तो ठीक ही हैं
पानी बरामदे में लगा है
आप शायद बैठना नहीं चाहते
कोई बात नहीं आप जैसा मुनासिब समझें

कहते हैं सबसे मिल कर दुख कम हो जाता है
शायद बंट जाता है
पर यहाँ तो लोग आपस में मिल कर और भी रो रहे हैं
ये ज़रूर है कि थोड़ी देर के बाद घर की बातें
बच्चों के किस्से
ऑफिस की गपशप आगे आ जाती है
माहॉल हल्का होने लगता है
और थोड़ी देर में ठहाके भी सुनाई पड़ते हैं
पर ज़रा दबेदबे, नज़रें बचा के

मैं सही हूँ
या नहीं
पता नहीं
शायद वैसे मुझे सोचने का हक़ नहीं है
मैंने वो हक़ खो दिया है
ये सत्य है कि
चलना बैठना बोलना भागना
अब मेरे लिये नहीं है
क्योंकि वो सब भौतिक हैं
परन्तु विचार का तो कोई रूप नहीं है
वो तो मन है
कहीं भी जा सकता है
कुछ भी कर सकता है
सबको छू सकता है
किसी के चेहरे इर्दगिर्द मंडरा सकता है
कहाँ चाय बन रही है देख सकता है
कौन रो रहा है
कौन कितना रो रहा है
किसको कितना दुःख है...

वर्षों से एक ख्याल मुझे गुदगुदाता रहा है...
"काश मैं अपनी मौत के बारे लिख पाऊं"





परेशां बुत

एक उम्र बिता कर सारे रिश्ते भुला कर अपना पराया गँवा कर ज़िन्दगी आ गयी है ऐसे मक़ाम पे जहाँ न सुकून है न दर्द है कभी सुकून है तो दर्द भी है दो...