मंगलवार, 23 मार्च 2021

एक बिचारा असंभव विचार

आप सब लोग आये
बेहद ख़ुशी हुई
इतने सारे जान पहचान के लोग एक साथ !
पर क्षमा करें
मैं आपके स्वागत में उठ नहीं सकता
हाथ नहीं मिला सकता
नमस्कार नहीं कर सकता
चलिए छोड़िए इस मुद्दे को
जी आप यहाँ इस तरफ की कुर्सी पर बैठ जाइये
और आप उस तरफ ... दरी पर जगह है
बच्चे तो ठीक ही हैं
पानी बरामदे में लगा है
आप शायद बैठना नहीं चाहते
कोई बात नहीं आप जैसा मुनासिब समझें

कहते हैं सबसे मिल कर दुख कम हो जाता है
शायद बंट जाता है
पर यहाँ तो लोग आपस में मिल कर और भी रो रहे हैं
ये ज़रूर है कि थोड़ी देर के बाद घर की बातें
बच्चों के किस्से
ऑफिस की गपशप आगे आ जाती है
माहॉल हल्का होने लगता है
और थोड़ी देर में ठहाके भी सुनाई पड़ते हैं
पर ज़रा दबेदबे, नज़रें बचा के

मैं सही हूँ
या नहीं
पता नहीं
शायद वैसे मुझे सोचने का हक़ नहीं है
मैंने वो हक़ खो दिया है
ये सत्य है कि
चलना बैठना बोलना भागना
अब मेरे लिये नहीं है
क्योंकि वो सब भौतिक हैं
परन्तु विचार का तो कोई रूप नहीं है
वो तो मन है
कहीं भी जा सकता है
कुछ भी कर सकता है
सबको छू सकता है
किसी के चेहरे इर्दगिर्द मंडरा सकता है
कहाँ चाय बन रही है देख सकता है
कौन रो रहा है
कौन कितना रो रहा है
किसको कितना दुःख है...

वर्षों से एक ख्याल मुझे गुदगुदाता रहा है...
"काश मैं अपनी मौत के बारे लिख पाऊं"





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