सोमवार, 17 मई 2021

परेशां बुत

एक उम्र बिता कर
सारे रिश्ते भुला कर
अपना पराया गँवा कर
ज़िन्दगी आ गयी है
ऐसे मक़ाम पे
जहाँ न सुकून है न दर्द है
कभी सुकून है तो दर्द भी है
दोनों साथ साथ हैं
फर्क मिट गया है दोनों के बीच का
कभी सुकून दर्द 
की वजह होता है
तो कभी दर्द में सुकून 
छुपा होता है

सूरज ढ़लता और चढ़ता साथ साथ
सुबह और शाम साथ साथ
ख़बर नहीं कि वक़्त चल रहा है
या थमा हुआ है

मैं कहीं जा रहा था
या आ रहा था
या ऐसा कुछ हुआ ही नहीं
मैं कहीं गया ही नहीं
कहीं जाने वाला ही नहीं था
आना जाना सिर्फ एक ख़याल था
हर एक शख्स बुत बना हुआ था
भागने के अंदाज़ में
वक़्त थमा हुआ था
क़लम रुकी हुई थी
लफ़्ज़ों के इंतज़ार में

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

छाया की क्षमता

दरवाज़ा खुला, फर्श पर एक छाया खड़ी थी खड़ी? खड़ी नहीं पड़ी थी मेरा मतलब छाया फर्श पर थी कुछ देर वो वहीं रुकी वो छाया फिर आहिस्ता से हिली और दूसरे...