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शनिवार, 16 मार्च 2019

पता नहीं क्यों

दूर वो जो पर्दा दिखाई देता है 
उस के पीछे कोई बैठा लगता है 
कभी कभी वो परदे पर एक अक्स छोड़ देता है 
पर कभी दिखाई नहीं देता 
मैंने तो उसे कभी देखा नहीं 
नहीं, असल में किसी ने भी नहीं 
कौन होगा वो 
और वहां क्यों छुपा बैठा है 
क्या उसे दुनिया की ज़रुरत नहीं है 
या शायद वो दुनिया से छुप रहा है 

आज मैंने दूर से देखा 
कुछ दूर पर लोगों का एक झुण्ड था 
वो सब उस परदे की ओर देख रहे थे 
ज़ोर ज़ोर से बातें कर रहे थे 
हाथ हिला-हिला कर इशारे कर रहे थे 
ऐसा लगा कि आज तो इस पर्दे का
पर्दा फाश करके रहेंगे
मैं उनके नज़दीक गया 
उन सबकी मिलीजुली आवाज़ों से कुछ समझ न आया 
फिर मैंने एक के कंधे पर हाथ रखा 
कोई फायदा नहीं हुआ 
दूसरे का हाथ पकड़ के उसे टोका  
तो वो दूसरा हाथ हिलाने लगा 
फिर मैंने उसे अपनी ओर खींचा
उसने बेहद अजीब नज़रों से मुझे देखा 
"क्या चाहिए", बोला
मैंने कहा, "ऐसा भी क्या हो गया 
इस परदे का किस्सा तो पुराना है"
"अजी जनाब आपको पता नहीं, 
उस परदे के पीछे एक नहीं दो लोग हैं" 
ज़हन में एक बिजली सी चमकी 
दो लोग!
कैसे? किसने देखा ?
सबने देखा 
पहले एक का सर ऊपर आया 
फिर छुप गया 
फिर दूसरे का 
और वो भी नीचे बैठ गया 
दो लोग!
कोई बोला "मुझे पता है दूसरा सर औरत का है
दोनों एक साथ ऊपर नहीं आते"
जैसे वो साथ दिखाई नहीं देना चाहते 
किसी को नहीं, कभी नहीं


मंगलवार, 15 अगस्त 2017

कुछ नहीं, पर अँधेरा तो है

इतना अँधेरा !
कहाँ से आया ये अँधेरा 
ये इतना घना क्यूँ है
ये अँधेरा सिर्फ बाहर ही नहीं है 
ये मेरे दिल में, मेरे रोम रोम में घर कर चुका है 
शायद मेरा चेहरा भी काला हो गया होगा 
मेरे हाथ पैर, पेट पीठ 
सब कुछ अँधेरे रंग में रंग गए होंगे
कुछ नज़र नहीं आ रहा 
अपनी हथेली तक नहीं  
क्या ये रात है? 
पर कहाँ गया वो चाँद ?
वो चाँद, तारे, वो टिमटिमाते सितारे
मेरी रोशनी के सहारे 

आज ठंड भी बहुत है 
काश ऊपर कुछ गरम होता 
कोई ऊनी कोट या कम्बल 
या - सिर्फ तुम्हारे होने का एहसास 
तुम्हारी नज़दीकी की गरमाहट
नरम हाथों की पकड़
उन खूबसूरत आँखों की रोशनी
आलिंगन की गरमी 

ज़िन्दगी कितनी खाली सी हो चुकी है 
कितनी नीरस, ठंडी 
अब इस घने अँधेरे में मैं तुम्हें कहाँ ढूँढूँ 
और कैसे ढूँढूँ 
किस तरफ जाऊं 
इस दुनिया में कोई ना दिखाई दे
कोई बात नहीं 
पर तुम न दिखोगी 
तो मेरी ऑंखें किस काम की  
मुझे इनकी ज़रुरत ना होगी 
तुम्हारा हाथ मेरे हाथ में न हो 
तो मेरी नब्ज़ किस काम की 
तुम्हारा सर मेरे सीने पर न हो 
तो ये धड़कन किस काम की


शनिवार, 1 अगस्त 2015

तेरी आँखों के सिवा

दुनिया दमक रही है
काले हीरों की चमक से

जड़ें प्यार की सूख गयी हैं
बुझी हुई बर्फीली नज़रों से

चेहरे पर जो ज़िन्दगी का इशारा सा है
वो है उन आंखों की याद से

सीने में अभी भी जो हरक़त है
दोस्त की मुस्कान की गर्मी से

कहानी, एक पुरानी

 नमस्कार महोदय नमस्कार, जी आप... कौन? पहचाना नहीं मैंने।  जी मैं एक दूत हूँ। नदी के तट पर जो धर्मशाला है वहां से आया हूँ।  इतनी दूर से? जी क...