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रविवार, 1 सितंबर 2019

दर्द सुकून का

पहले हर दर्द से डर लगता था 
अब लगता है ग़लत लगता था
 
अब तो दास्तान ए दर्द के दीवान पढ़े जाते हैं 
तब बड़ी मुश्किल से एक पन्ना पलटता था 

बहुत कुछ मिला उससे, मेरी ख़ुशनसीबी 
वो ख़ुद मिलता तो और अच्छा लगता था 

पर्त दर पर्त मैंने ख़ुद में ढूँढा उसको 
किसी पर्त में तो मिल जायेगा ऐसा लगता था 

एहमियत ख़त्म हो गयी हर सुकून हर दर्द की
पहले हर नफ़े नुक़सान का हिसाब रखता था 

मिट गयीं सरहदें सुकून और दर्द की 'दोस्त' 
पहले तो सुकून में भला, दर्द में बुरा लगता था

मंगलवार, 27 जून 2017

चाय वाली मुहब्बत

अरे सुनो मुझसे मुहब्बत करोगी 
सुनो तो सही 
एक मिनट, एक मिनट बस एक मिनट
मोहब्बत की ही तो बात कर रहा हूँ 
शादी की नहीं 
मोहब्बत में किसी का कुछ नहीं जाता 
शादी में तो तुम्हें पता ही होगा 
ज़िन्दगी दांव पे लगानी पड़ती है 
वो ज़िन्दगी भर का खेल है 
प्यार का क्या है 
मुझे कोई पसंद आयी 
किसी को मैं पसंद आया 
"नमस्ते जी क्या आप मेरे साथ एक कप चाय पिएंगी"
"ठीक है पर पहले एक गिलास पानी" 

देखा आपने
बस इतनी सो बात है 
इसमें क्या डरना 
चाय के दौरान कुछ बातें होंगी ही 
शायद फोन नंबर भी बदले जाएँ 
फिर शायद फोन हो भी जाये 

एक कप चाय, एक कॉफी, एक वडा पाव 
कुछ खाली थोड़ी भरी लोकल ट्रेन
दोनों के बीच एक बिसलरी की बोतल 
बदला बदला सा पानी का स्वाद 
एक जाना अनजाना स्टेशन 
शहर कम गाँव ज़्यादा 
फिर कुछ दूर पर वो मशहूर ढाबा
खाना बढ़िया था 
बिल भी बुरा नहीं था 
"अरे वेटर वो ऊपर होटल भी है क्या"
"साब आप जैसे कई लोग आते हैं न 
वो रुक जाते हैं दो चार घंटे  
कभी कभी सारी रात भी 
उनके लिए"

निगाहें मिलीं एक जोड़ी झुकीं 
एक रुकी रहीं 
एक दबी हलकी सी आवाज़,
अगले हफ्ते आएंगे, आज नहीं 

मैंने कहा था न मुहब्बत कोई टेढ़ी खीर नहीं है 
बल्कि काफी आसान है 

'दोस्त' मुझे तो पीनी है चाय 
आपको नहीं चाहिए तो कोई दिक़्क़त नहीं
हैव ए गुड डे

मंगलवार, 2 मई 2017

कहीं ये वो तो नहीं

इतना अँधेरा !
क्यों हैं इतना अँधेरा 
और कोई क्यों नहीं दिखाई देता 
क्या इस दुनिया में सिर्फ मैं ही बचा हूँ 
बाकी दुनिया कहाँ है 
दुनिया वाले कहाँ हैं 
वो सब लोग ... 
क्या कोई बम फट गया 
या कोई भयानक आग लग गयी 
पर ... इस अँधेरे में आग भी नज़र नहीं आ रही 
धुआं ... वो भी नहीं 
ये ... ये क्या जगह है 
कौन सा शहर है 
ये सड़क है या कोई वीराना 
किसीका कोई घर 
इंसान की कोई आवाज़
कोई हरकत किसी पेड़ की 
हवा का कोई झोंका 
उफ़ ... अब मैं इस दुनिया में अकेला ही हूँ 

एका-एक घुप्प अँधेरे में 
अँधेरे का ही एक टुकड़ा हिला 
... ज़रा सा
और उस अंधेरे से निकल कर 
मेरी ही डगर की तरफ आने लगा 
... ओह तो मेरे जैसा एक और भी है 
मैंने सोचा चलो कोई तो मिला 
पर मन में डर भी था 
पता नहीं कौन ...
दोस्त या कोई और 
पर उस अँधेरे के टुकड़े ने दुश्मन जैसी कोई हरकत नहीं की 
वो बेहद आहिस्ता से कुछ नज़दीक आया 
फिर रुक गया 
फिर चला फिर रुक गया 
फिर चला ...
इस रुकने चलने में हमारी दूरी काफी कम हो गयी 
मुझे लगा ये दोस्त हो न हो 
दुश्मन तो बिल्कुल नहीं है 
धीरे धीरे वो साया मेरे पीछे आ गया 
मैं ज़रा हिचकिचाया फिर रुक ही गया 
मेरे कंधे पर एक हाथ आया 
मैं मुड़ न सका 
दो तरह के डर मन में भरे हुए थे 
दोनों ही हालातों में दिल को संभालना मुश्किल होगा
...एक ये कोई अनजाना दुश्मन न हो  
या वो दोस्त सारी उम्र जिसका इंतज़ार किया

बुधवार, 21 दिसंबर 2016

अंधेरों के साये

हम हैं साये अंधेरों के
हमें आँखों से नहीं देख पाओगे
यहाँ या वहां हम नहीं मिलने वाले
हमें सिर्फ ख़यालों से ही ढूंढ पाओगे
ग़र आवाज़ देनी हो हमें
तो खुद को पुकार लो
कोई नया गीत गुनगुना लो
हमारे नाम ज़बान से ले पाओगे
हमारे कंधे पर तुम्हारा ये ख़याली हाथ
अब नहीं दे सकेगा ख़याली सहारा
साथ, मदद या आसरा
फ़र्क़ नहीं पड़ता अब
किसी बात से
पता नहीं कैसे
अब हमें कोई छू नहीं सकता
अजीब किल्लत है
जब कन्धा था तो हाथ नहीं थे
अब कई हाथ इसके मुंतज़िर हैं
ये कलाई थामने को बेकरार हैं
शायद फिर हो गया मैं
एक खुशफहमी का शिकार
पता नहीं क्या हुआ है
सब कुछ धुआं हो गया है
मैं यहाँ हूँ या नहीं
यहाँ नहीं तो...
तो फिर कहीं तो हूँगा
जहाँ कहीं भी हूँ
वहां कोई तो होगा
जो शायद मुझे देख सकता होगा
इसके बावज़ूद मुझसे मुख़ातिब होगा 
अगर ऐसा होगा 'दोस्त'

तो वो भी अंधेरों का साया होगा

रविवार, 12 जुलाई 2015

मेरा अस्तित्व, मेरी छाया

दिन को धूप की तेज़ रोशनी है
सुबह, शाम एक नारंगी एहसास है
रात को चांदनी का ठंडा उजाला है
अगर कहीं ये सब नहीं है
तो वहां बिजली है
उसकी की चमक है
तेज़ उजाले में स्वयं को चमकता देख कर
मन गर्व से भर जाता है
विश्वास हो जाता है कि लोग मुझे ही देख रहे हैं
और ये भी कि
वो मुझे देख कर प्रसन्न हैं
ये बेबुनियाद जानकारी
मेरे अभिमान को बढ़ाती है
मेरे गर्व की छाया मेरे साथ चलती है
चलती रही है
कभी कभी मैं उसे मुड़ के देख  लेता हूँ
बड़ा संतोष होता है
उसे पीछे पीछे आते देख कर
कैसे पिछलग्गू की तरह साथ रहती है
क्या जीवन है इस बेचारी का भी
पीछे पीछे रहना बस
कोई मांग, क्रोध, कोई दुःख

सुना था पर जब देखा तो  पता चला
ये रौशनी हमेशा रहने वाली नहीं थी
अँधेरा आया और बिना किसी प्रयत्न के
निगल गया रोशनी को
और मेरी छाया को
रौशनी ने मेरा साथ छोड़ा तो
छाया भी साथ नहीं रही
वो घुल गयी अँधेरे ही में
छाया के साथ ही मिट गया मेरा गर्व
मेरा अभिमान
मेरी पहचान
मेरा अस्तित्व भी

कदाचित

शनिवार, 11 जुलाई 2015

पहली मुलाक़ात

याद है मुझको वो लम्हा
जब हमारी नज़रें 
मुख्तलिफ़ ख़ूबसूरत नज़ारों से फिसल कर
आपस में टकरा गईं थीं
लगा था एक तेज़ झटका सा
और मेरे दिल पर पड़ा एक भारी सा पत्थर
खिसक कर गिरा और 
तुम्हारे दिल के पत्थर से जा टकराया 
हवा का एक हल्का सा झोंका आया 
तुम्हारा सिलेटी दुपट्टा लहराया
और दुपट्टे की लहरों पे मचलते वो पत्थर
गहरी वादियों में यूं ग़ुम हो गए
जैसे हवाओं का एक झोंका
फूलों के बगीचे में से गुज़र जाए


कहानी, एक पुरानी

 नमस्कार महोदय नमस्कार, जी आप... कौन? पहचाना नहीं मैंने।  जी मैं एक दूत हूँ। नदी के तट पर जो धर्मशाला है वहां से आया हूँ।  इतनी दूर से? जी क...