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शनिवार, 16 मार्च 2019

पता नहीं क्यों

दूर वो जो पर्दा दिखाई देता है 
उस के पीछे कोई बैठा लगता है 
कभी कभी वो परदे पर एक अक्स छोड़ देता है 
पर कभी दिखाई नहीं देता 
मैंने तो उसे कभी देखा नहीं 
नहीं, असल में किसी ने भी नहीं 
कौन होगा वो 
और वहां क्यों छुपा बैठा है 
क्या उसे दुनिया की ज़रुरत नहीं है 
या शायद वो दुनिया से छुप रहा है 

आज मैंने दूर से देखा 
कुछ दूर पर लोगों का एक झुण्ड था 
वो सब उस परदे की ओर देख रहे थे 
ज़ोर ज़ोर से बातें कर रहे थे 
हाथ हिला-हिला कर इशारे कर रहे थे 
ऐसा लगा कि आज तो इस पर्दे का
पर्दा फाश करके रहेंगे
मैं उनके नज़दीक गया 
उन सबकी मिलीजुली आवाज़ों से कुछ समझ न आया 
फिर मैंने एक के कंधे पर हाथ रखा 
कोई फायदा नहीं हुआ 
दूसरे का हाथ पकड़ के उसे टोका  
तो वो दूसरा हाथ हिलाने लगा 
फिर मैंने उसे अपनी ओर खींचा
उसने बेहद अजीब नज़रों से मुझे देखा 
"क्या चाहिए", बोला
मैंने कहा, "ऐसा भी क्या हो गया 
इस परदे का किस्सा तो पुराना है"
"अजी जनाब आपको पता नहीं, 
उस परदे के पीछे एक नहीं दो लोग हैं" 
ज़हन में एक बिजली सी चमकी 
दो लोग!
कैसे? किसने देखा ?
सबने देखा 
पहले एक का सर ऊपर आया 
फिर छुप गया 
फिर दूसरे का 
और वो भी नीचे बैठ गया 
दो लोग!
कोई बोला "मुझे पता है दूसरा सर औरत का है
दोनों एक साथ ऊपर नहीं आते"
जैसे वो साथ दिखाई नहीं देना चाहते 
किसी को नहीं, कभी नहीं


बुधवार, 31 अक्तूबर 2018

ग़ज़ल और हार

सोचता हूँ चंद शेर कहूँ 
चंद... से मक़सद है कि
कम से कम इतने तो हो जाएं 
कि एक ग़ज़ल की माला अपने गले में पड़ जाये 
चलो ग़ज़लों की रवानगी न हो सके, न सही
एक नज़्म की नज़ाक़त ही हाथ लग जाये 

चलिए पहले मुद्दा तो ढूंढ लें 
जनाब शायद आप मतले की बात कर रहे हैं 
मुआफ करें क़िबला... आपने सही फ़रमाया 
मतला, मतला --
ख़ैर तो एक बार फिर 
काम आएगी ज़िन्दगी,
ज़िन्दगी जो मक़्ते तक पहुँच गयी है
कितना कुछ है इसके दामन में 
इश्क़, जुदाई, मिलन, खुशियां
हसरतें, लालच, चोटें, सुबकियां 
कुछ सख़्त हिदायतें, चंद ट्रॉफियां
और भी बहुत कुछ... 
अब कोशिश शुरू की जाये 
तो जनाब मुलाहज़ा हो जाए -- 

वो कल मिले और आज बिछड़ गए 
वो कल मिले और आज बिछड़ गए 

पर मैंने मुक़र्रर तो सुना ही नहीं 
जी शायद सुनाई नहीं दिया होगा  
यहाँ शोर भी बहुत है 
है ना 
ख़ैर ग़ौर फरमाएं 

वो कल मिले और आज बिछड़ गए  
इतनी जल्दी जनाब के तेवर बदल गए 

शुक्रिया शुक्रिया... आदाब

वो कल मिले और आज बिछड़ गए  
इतनी जल्दी जनाब के तेवर बदल गए 
अरमानों पर मेरे बादल घिर आये 
मुझसे क्या ग़लत हुआ कोई बतलाये 
ये बिला वजह था, यही कह जाये 
जो अब तक न हुआ वो हो जाये 
कोई नयी नवेली ही घट जाये 
पुराना सब कुछ दफ़्न हो जाये 
अच्छे वक़्त का बीज जम जाये 
और बुरे दिनों पर मिट्टी पड़ जाये --

जी अब ज़रा सोचने के लिए वक़्फ़ा --
म्यां ज़रा वो पानी का प्याला इधर सरकाना 
शायद इसीको पानी मांगना कहते होंगे 

ग़र कुछ देर और ये सिलसिले चल जाते  
'दोस्त' इनमें कुछ और शेर जुड़ जाते 
हमने ग़ज़लों के पैगम्बर का क्या बिगाड़ा था 
हार नहीं मांगीग़ज़ल का हार माँगा था। 

अगर आपको पसंद न आई तो क़ुसूर आपका नहीं है

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

कुछ नहीं, पर अँधेरा तो है

इतना अँधेरा !
कहाँ से आया ये अँधेरा 
ये इतना घना क्यूँ है
ये अँधेरा सिर्फ बाहर ही नहीं है 
ये मेरे दिल में, मेरे रोम रोम में घर कर चुका है 
शायद मेरा चेहरा भी काला हो गया होगा 
मेरे हाथ पैर, पेट पीठ 
सब कुछ अँधेरे रंग में रंग गए होंगे
कुछ नज़र नहीं आ रहा 
अपनी हथेली तक नहीं  
क्या ये रात है? 
पर कहाँ गया वो चाँद ?
वो चाँद, तारे, वो टिमटिमाते सितारे
मेरी रोशनी के सहारे 

आज ठंड भी बहुत है 
काश ऊपर कुछ गरम होता 
कोई ऊनी कोट या कम्बल 
या - सिर्फ तुम्हारे होने का एहसास 
तुम्हारी नज़दीकी की गरमाहट
नरम हाथों की पकड़
उन खूबसूरत आँखों की रोशनी
आलिंगन की गरमी 

ज़िन्दगी कितनी खाली सी हो चुकी है 
कितनी नीरस, ठंडी 
अब इस घने अँधेरे में मैं तुम्हें कहाँ ढूँढूँ 
और कैसे ढूँढूँ 
किस तरफ जाऊं 
इस दुनिया में कोई ना दिखाई दे
कोई बात नहीं 
पर तुम न दिखोगी 
तो मेरी ऑंखें किस काम की  
मुझे इनकी ज़रुरत ना होगी 
तुम्हारा हाथ मेरे हाथ में न हो 
तो मेरी नब्ज़ किस काम की 
तुम्हारा सर मेरे सीने पर न हो 
तो ये धड़कन किस काम की


सोमवार, 7 अगस्त 2017

मेहमान दर्द

एक दिन ऐसा एहसास हुआ मुझे
कि जैसे किसीने पुकारा हो मुझे 
देखा इधर उधर 
पर न आया कोई नज़र 
फिर किसीने हल्के से छू दिया मुझे 
घबरा के मैंने पूछा,

"कौन हो भाई दिखाई क्यों नहीं देते"

एक सकपकाई सी आवाज़ आई
"जी मैं यहीं हूँ, आपके बिलकुल नज़दीक"

बग़ैर देखे ही मैंने तीर चला दिया 
"जनाब मैंने पहचाना नहीं 
हम पहले मिले हैं क्या?"

"जी अभी तक तो नहीं"

"तो फरमाएं, कौन हैं आप"

"जी मैं, मैं एक दर्द हूँ"

"दर्द ? आपको मुझसे क्या सरोकार है"

"जी ... रहने को जगह मिलेगी कुछ दिन के लिए"

"जी! रहने को जगह?
नहीं भाई मुश्किल है मेरे लिए आपको जगह देना 
देखो न मेरे सारे ख़ाने आराम से भरे हैं 
अब आराम से आराम करते हुए आराम को निकाल कर
दर्द को जगह देना बेवकूफी होगी ना 
मेरी कितनी बदनामी होगी कुछ ख़बर भी है आपको"

"अरे जनाब इतने बड़े जिस्म में कोई तो ऐसा ख़ाना होगा 
जहाँ आराम इतना ज़्यादा हो कि मेरा पता ही न चले"
"हैं ! क्या ऐसी भी कोई जगह हो सकती है? पर आप कौन से दर्द हैं 
मसलन सर के पेट के या ..."
"नहीं नहीं ऐसा नहीं है हम तो जहाँ चले जाएँ वही नाम ले लेते हैं 
मसलन सर दर्द, पीठ दर्द, पेट दर्द वगैरह"
"हम्म ..."
"जी ज़रुरत पड़े तो हम हाथ की उंगली में भी रह लेंगे 
पर अगर दो में से एक घुटना मिल जाता तो  क्या बात थी

"ये तो आप ज़्यादती कर रहे हैं 
आराम की भी अपनी ज़िन्दगी है"

"अरे बहुत कर लिया आराम 
अब हमारे जैसे बेसहारों को भी जगह मिलनी चाहिए 
और कितनी रंग बिरंगी विटामिन की गोलियां निगलोगे
अपने अंदर का माहौल तो एक दिन बर्बाद होना ही है  
फिर उस बर्बादी के पैसे भी देने होंगे
मियां अब आराम का वक़्त जाता रहा 
अब ज़माना है परेशानी का
नई नई तरह तरह की अजीबो ग़रीब परेशानियां
इनसे आदमी का दिमाग़ ज़्यादा चलने लगता है 
अरे जब किसी मुसीबत को टालना हो तो नए तरीके ईजाद करने पड़ते हैं 
है कि नहीं?
तो जनाब अगर आप हमें रहने की जगह दे दें
तो आप इससे कहीं ज़्यादा अक़लमंद हो जायेंगे 
ये वादा है"

"आपकी जिरह का भी जवाब नहीं 
ठीक है, तो आइये
जहाँ जगह मिले रह जाइये  
आराम से तमीज़ से बात कीजियेगा" 

इसके बाद तो जनाब कलाई से लेकर सर तक 
कंधे से एड़ी तक 
पेट, पीठ, कमर हर जगह भर गयी दर्द से 
हक़ीम के माथे की शिकन बढ़ गयी
दवाएं धीरे धीरे कम हुईं
फिर बंद हो गयीं
उनके दोनों हाथ दुआ पर आकर ठहर गए 
कहा अब कोई इलाज नहीं 
लुत्फ़ लीजिये इनका 
दर्द ही तो है कोई मौत तो नहीं 

बात मुझे सही लगी 
उसके पीछे का जज़्बा भी सही लगा
भई अब ये बिचारे कहाँ जाते?
सोच के मैंने इन्हें अपना लिया 
अब ये सारे दर्द मेरे हैं 
मेरे अपने हैं 
ये मुझे ज़्यादा तकलीफ भी नहीं देते 
हो सकता है आदत पड़ गयी हो  
ये सब अब मेरे साथ ही रहेंगे 
मैं इनका साथ आख़ीर तक न छोड़ूंगा
अब हम बिछड़ेंगे 
तो उस गर्म माहौल में
जब मुझे ख़ुद से, इनसे और इन्हें मुझसे 
मिल जाएगी निजात

आख़ीर में हम इस नतीजे पहुंचे 'दोस्त'
कि दर्द और परेशानियां तो हमेशा ही रहेंगी
पर आप उनके दोस्त बन कर रहोगे
या उनकी दुश्मनी मोल लोगे?

रविवार, 2 जुलाई 2017

क्या करें क्या ना करें

अब वक़्त आ पहुंचा है वहां, जहाँ
इसे बहुत वक़्त पहले पहुँच जाना चाहिए था 
वक़्त की मीठी बातों में उलझे रहे हम 
हमें इसका इंतज़ार ही नहीं करना चाहिए था
अगर कुछ करना था तो उठते और उठ कर, कर देते 
किसीकी हामी या आँख के इशारे को नहीं देखना चाहिए था 
चलो अब तो जो हुआ सो हुआ,
कर चुके जो भी करना या ना करना चाहिए था 
बड़े खुश थे हम हज़ारों दिन जेब में लिए 
जोश में खर्च कर दिए आधे, जो क़तई नहीं करना चाहिए था 
कोई तो बताये कि हमने क्या सही, क्या ग़लत किया 
क्या हम वो सब ही करते रहे जो हमें ना करना चाहिए था?
किस तरफ चलते किस बात की कोशिश करते 'दोस्त' 
मंज़िल ख़ुद वहां डेरा डाले बैठी थी जहाँ पहले हमें होना चाहिए था


सोमवार, 26 जून 2017

कहानी, 'की' और 'का' की

का: आओ यहाँ बैठें। 
की: यहाँ?
का: क्यों? ये जगह ठीक ना हो तो कहीं और चलते हैं। 
की: नहीं नहीं मैं तो यूँ ही कह रही थी। 
का: नहीं तुम शायद सही हो, चलो ज़रा उस तरफ देखते हैं। 
की: हाँ वहां से झील का नज़ारा ठीक से दिखाई देगा। 
का: हाँ चलो। 
की: बारिश में कितनी सुन्दर लग रही है न झील ?
का: ठीक कह रही हो।   
की: सब कुछ धुल गया है।  साफ़ सुथरे पेड़।  चमकदार हरे पत्ते। 
का: ये, ये जगह ठीक है क्या ?
की: ये? ये जगह तो ठीक है पर देखो गीली तो नहीं है?
का: हाँ, है तो गीली। कपडे ख़राब हो जायेंगे। 
की: नहीं बाबा। वो हुआ तो घर में मुश्किल हो जाएगी। 
का: अब बारिश के मौसम में सूखी घास तो मिलेगी नहीं। 
की: तब तो मैं थक जाउंगी। 
का: वो पेड़ है न, वो बड़ा और घना वाला।  चलो उसके पीछे चलते हैं। 
की: वहां जगह होगी क्या ?
का: जगह का तो पता नहीं पर वो जगह थोड़ी छुपी सी है। है न?
की: छुपी ? तो उससे क्या होगा ?
का: कुछ खास नहीं। वहां हमें कोई देख नहीं सकेगा। 
की: अरे, तो वहां क्यों जाएँ ?
का: तुम्हें मेरे साथ अकेले क्यों आना था ?
की: मुझे ये झील देखनी थी और बाइक पर तो दो ही बैठ सकते हैं न। 
का: क्या !
की: रुको मैं कुछ फोटो ले लूँ फिर वापस चलेंगे 
का: तुम अपना काम कर लो मैं बाइक के पास हूँ। 
की: ठीक है मैं दस मिनट में आयी 

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कैमरे की क्लिक ...


मंगलवार, 2 मई 2017

कहीं ये वो तो नहीं

इतना अँधेरा !
क्यों हैं इतना अँधेरा 
और कोई क्यों नहीं दिखाई देता 
क्या इस दुनिया में सिर्फ मैं ही बचा हूँ 
बाकी दुनिया कहाँ है 
दुनिया वाले कहाँ हैं 
वो सब लोग ... 
क्या कोई बम फट गया 
या कोई भयानक आग लग गयी 
पर ... इस अँधेरे में आग भी नज़र नहीं आ रही 
धुआं ... वो भी नहीं 
ये ... ये क्या जगह है 
कौन सा शहर है 
ये सड़क है या कोई वीराना 
किसीका कोई घर 
इंसान की कोई आवाज़
कोई हरकत किसी पेड़ की 
हवा का कोई झोंका 
उफ़ ... अब मैं इस दुनिया में अकेला ही हूँ 

एका-एक घुप्प अँधेरे में 
अँधेरे का ही एक टुकड़ा हिला 
... ज़रा सा
और उस अंधेरे से निकल कर 
मेरी ही डगर की तरफ आने लगा 
... ओह तो मेरे जैसा एक और भी है 
मैंने सोचा चलो कोई तो मिला 
पर मन में डर भी था 
पता नहीं कौन ...
दोस्त या कोई और 
पर उस अँधेरे के टुकड़े ने दुश्मन जैसी कोई हरकत नहीं की 
वो बेहद आहिस्ता से कुछ नज़दीक आया 
फिर रुक गया 
फिर चला फिर रुक गया 
फिर चला ...
इस रुकने चलने में हमारी दूरी काफी कम हो गयी 
मुझे लगा ये दोस्त हो न हो 
दुश्मन तो बिल्कुल नहीं है 
धीरे धीरे वो साया मेरे पीछे आ गया 
मैं ज़रा हिचकिचाया फिर रुक ही गया 
मेरे कंधे पर एक हाथ आया 
मैं मुड़ न सका 
दो तरह के डर मन में भरे हुए थे 
दोनों ही हालातों में दिल को संभालना मुश्किल होगा
...एक ये कोई अनजाना दुश्मन न हो  
या वो दोस्त सारी उम्र जिसका इंतज़ार किया

बुधवार, 22 मार्च 2017

अंधेरों का पहाड़

वो, दूर जो अँधेरा दिखाई दे रहा है ना 
काले पहाड़ जैसा 
हाँ वही, अँधेरे का पहाड़ 
उसके उस पार,
उधर उसके दूसरी तरफ 
जी हाँ उधर ही, वहीँ कहीं 
मेरी रोशनी छुपी बैठी है 
क्यों आप नहीं देख पा रहे उसे ?
वो, अँधेरे के ठीक बीचो बीच 
ध्यान लगाइये 
मैं तो आसानी से देख सकता हूँ 
अँधेरा है तो क्या हुआ 
देखना तो रोशनी को है ना  
अँधेरा अपनी जगह, रोशनी अपनी जगह 
हाँ, मैं मनाता हूँ कि अगर रोशनी हो
तो अँधेरा नहीं हो सकता 
दोनों एक साथ नहीं रह सकते 
पर अब ऐसा है तो क्या करें 
ठीक है, आपकी बात...
मैं मानता हूँ 
आपको रोशनी नहीं दिखाई दे रही 
और मुझे?
वैसे, मुझे भी इतनी ठीक से...  
पर वो है ज़रूर 
वहीँ उस अँधेरे की खाई के उस पर 
नहीं नहीं पहाड़ के उस पार 
मुझे... जाना है वहां 
उसके बग़ैर मैं...
पर देखो, एक बार चल पड़ा तो
रास्ता भी मिल ही जायेगा 
जहाँ चाह वहां राह 
शायद उस अँधेरे पहाड़ के रास्तों पर रोशनी हो 
या शायद, न भी हो 
इसलिए अँधेरे के अंदर सीधे चलना ही मुनासिब होगा 
जब दिखाई न दे, तो सीधे चलना चाहिए 
पता नहीं रास्ते में क्या मिल जाये 
क्या टकरा जाये 
कांटे पत्थर खाई 
सांप बिच्छू जानवर 
कुछ भी मिल सकता है 
हाँ, अगर सोचो तो...
मेरे जैसे इंसान भी मिल सकते हैं 
क्या दुनिया में रोशनी तलाश सिर्फ मुझे है?
क्या उस पार के लोगों को 
इस पार की रोशनी की तलाश नहीं होगी? 
हो भी सकती है

मेरा समंदर

अब नहीं मचते तहलके मन के अंदर 
कुछ शांत हो गया सा लगता है 
पता नहीं कैसे, पर 
तूफानी लहरों की ऊंचाई कुछ कम हो गयी 
कम  होती गयी
फिर धीरे चीरे रुक गयी 
अब कोई हलचल नज़र नहीं आती 
दूर दूर तक 
मेरा वो तूफानी समंदर अब ठहर गया है 
पानी के सीधे मैदान जैसा हो गया है 
पानी के रेगिस्तान जैसा 
जिसमे कोई लहर नहीं 
कोई टीला नहीं 
कोई घास या पेड़ नहीं

हाँ कभी कभी अभी भी 
हवा का एक झोंका 
कोशिश करता है 
कि मैं कुछ कहूँ 
ऊपर ऊपर से ही सही 
ज़रा उत्तेजित हो जाऊं 
खुश दिखाई दूं 
लहरें बनाऊं 
उछलूँ हवा से खेलूं 
पर कुछ देर की कोशिश के बाद 
हवा थक जाती है 
रुक जाती है 
मेरा रूखापन उसे अच्छा नहीं लगता
वो ठहर जाती है 
पीछे मुड़ जाती है 
मुझे तो इसका भी बुरा नहीं लगता 
कि उसको बुरा लग रहा है 
हवा तो दुनिया भर में घूमती है 
घूम सकती है 
ढूंढ लेगी कहीं कोई दूसरा समंदर

शनिवार, 21 जनवरी 2017

वक़्त बराबरी का

शायद वक़्त आ गया है 
बग़ावत का 
उनसे बराबरी का 
बराबरी के जवाब का 
वैसे ही सख़्त जवाब का 
कभी कभी सोचता हूँ 
क्यों न मैं भी उन जैसा बन जाऊं
मानता हूँ मेरे लिए आसान नहीं होगा 
दूसरों जैसा बनना
उन जैसी गन्दी नाली में उतर कर 
उनसे लड़ना 
उनकी ज़बान में 
उनके पैतरों से 
उन्हें जवाब देना 
असल में मैं वैसा, उन जैसा नहीं हूँ 
पर क्या करूं कब तक जाने दूँ 
उनको सबको 
भर चुका है मेरा प्याला 
दुनिया की कड़वी बातों से 
ऊंचे सुर की आवाज़ों से ...  
अब बुरा न मानें
पर वक़्त निकल गया 
मुरव्वतों का 
मीठी ज़बान का 
कही अनकही करने का 
देखी अनदेखी करने का 
सुनी अनसुनी करने का 
अब तो जनाब यूँ है कि 
उधर से अगर एक ग़लत लफ्ज़ का इस्तेमाल हो गया 
या ऊंचा सुर पकड़ लिया
तो दोस्त समझदारी इसीमें होगी 
कि बराबरी के जवाब के लिए तैयार रहियेगा

बुधवार, 21 दिसंबर 2016

अंधेरों के साये

हम हैं साये अंधेरों के
हमें आँखों से नहीं देख पाओगे
यहाँ या वहां हम नहीं मिलने वाले
हमें सिर्फ ख़यालों से ही ढूंढ पाओगे
ग़र आवाज़ देनी हो हमें
तो खुद को पुकार लो
कोई नया गीत गुनगुना लो
हमारे नाम ज़बान से ले पाओगे
हमारे कंधे पर तुम्हारा ये ख़याली हाथ
अब नहीं दे सकेगा ख़याली सहारा
साथ, मदद या आसरा
फ़र्क़ नहीं पड़ता अब
किसी बात से
पता नहीं कैसे
अब हमें कोई छू नहीं सकता
अजीब किल्लत है
जब कन्धा था तो हाथ नहीं थे
अब कई हाथ इसके मुंतज़िर हैं
ये कलाई थामने को बेकरार हैं
शायद फिर हो गया मैं
एक खुशफहमी का शिकार
पता नहीं क्या हुआ है
सब कुछ धुआं हो गया है
मैं यहाँ हूँ या नहीं
यहाँ नहीं तो...
तो फिर कहीं तो हूँगा
जहाँ कहीं भी हूँ
वहां कोई तो होगा
जो शायद मुझे देख सकता होगा
इसके बावज़ूद मुझसे मुख़ातिब होगा 
अगर ऐसा होगा 'दोस्त'

तो वो भी अंधेरों का साया होगा

शुक्रवार, 3 जून 2016

यहाँ हूँ... मैं

मैं  कहीं गया
 वापस ही आया
ना ही ये सोचा कि
कहीं जाऊं
यहाँ या वहां
यहाँ वहां के बारे में सोचूँ
या अभी रहने दूँ
फिर कभी देख लूँगा
ये करूँ या वो
कुछ करुं भी
या फिलहाल कुछ नहीं
यहीं बैठा रहूं 'दोस्त'
या ज़रा सरक के
उधर हो को जाऊं
उधर ज़रा अच्छा सा लगता है
शायद क्योंकि मैं वहां नहीं

यहाँ हूँ

 





राह और राही

जीवन में हम रहे मगन
चले दिए उधर
ले गया जिधर मन
चलते रहे चलते ही रहे हरदम
देखते दाएं बाएं ऊपर नीचे
नदी तालाब बाग़ बगीचे
पैरों की थकावट नापते
रुक गए जहाँ थक गया बदन

राही राह का होता है
राह भी राही से बनती है
दोनों के वजूद मिट जायें
ग़र राही को लग जाये
मंज़िल से लगन

ज़रा देखा जांचा परखा
पेड़ को, उसकी छाँव को
फूलों फलों को
आते जाते, सुस्ताते लोगों को 
जब लगी लगाव की अगन
अशांत सा हो गया जीवन

वो राह थी इंतज़ार में राही के
राही को भी रास आई मंज़िल
उचटने सा लगा था मन
निकल पड़े फिर से,
राम राम पेड़ भाई
फल फूल तितली भँवरे
आप सब बहुत सुंदर हैं
सुरीले हैं मीठे हैं
पर वो राह मेरे बिना अकेली है
वो दिन रात उसी जगह मेरा इंतज़ार करती है
जहाँ मैं उसे छोड़ आया था
ज़रा भी टस से मस नहीं होती
उसे लगता है अगर वो चल पड़ी तो
मैं उसे कहाँ ढूंढूंगा
उसे बेहद प्यार है मुझसे
राह से वफ़ादार 'दोस्त' कोई नहीं
अपने राही के लिए

कहानी, एक पुरानी

 नमस्कार महोदय नमस्कार, जी आप... कौन? पहचाना नहीं मैंने।  जी मैं एक दूत हूँ। नदी के तट पर जो धर्मशाला है वहां से आया हूँ।  इतनी दूर से? जी क...