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रविवार, 1 सितंबर 2019

दर्द सुकून का

पहले हर दर्द से डर लगता था 
अब लगता है ग़लत लगता था
 
अब तो दास्तान ए दर्द के दीवान पढ़े जाते हैं 
तब बड़ी मुश्किल से एक पन्ना पलटता था 

बहुत कुछ मिला उससे, मेरी ख़ुशनसीबी 
वो ख़ुद मिलता तो और अच्छा लगता था 

पर्त दर पर्त मैंने ख़ुद में ढूँढा उसको 
किसी पर्त में तो मिल जायेगा ऐसा लगता था 

एहमियत ख़त्म हो गयी हर सुकून हर दर्द की
पहले हर नफ़े नुक़सान का हिसाब रखता था 

मिट गयीं सरहदें सुकून और दर्द की 'दोस्त' 
पहले तो सुकून में भला, दर्द में बुरा लगता था

शनिवार, 16 मार्च 2019

पता नहीं क्यों

दूर वो जो पर्दा दिखाई देता है 
उस के पीछे कोई बैठा लगता है 
कभी कभी वो परदे पर एक अक्स छोड़ देता है 
पर कभी दिखाई नहीं देता 
मैंने तो उसे कभी देखा नहीं 
नहीं, असल में किसी ने भी नहीं 
कौन होगा वो 
और वहां क्यों छुपा बैठा है 
क्या उसे दुनिया की ज़रुरत नहीं है 
या शायद वो दुनिया से छुप रहा है 

आज मैंने दूर से देखा 
कुछ दूर पर लोगों का एक झुण्ड था 
वो सब उस परदे की ओर देख रहे थे 
ज़ोर ज़ोर से बातें कर रहे थे 
हाथ हिला-हिला कर इशारे कर रहे थे 
ऐसा लगा कि आज तो इस पर्दे का
पर्दा फाश करके रहेंगे
मैं उनके नज़दीक गया 
उन सबकी मिलीजुली आवाज़ों से कुछ समझ न आया 
फिर मैंने एक के कंधे पर हाथ रखा 
कोई फायदा नहीं हुआ 
दूसरे का हाथ पकड़ के उसे टोका  
तो वो दूसरा हाथ हिलाने लगा 
फिर मैंने उसे अपनी ओर खींचा
उसने बेहद अजीब नज़रों से मुझे देखा 
"क्या चाहिए", बोला
मैंने कहा, "ऐसा भी क्या हो गया 
इस परदे का किस्सा तो पुराना है"
"अजी जनाब आपको पता नहीं, 
उस परदे के पीछे एक नहीं दो लोग हैं" 
ज़हन में एक बिजली सी चमकी 
दो लोग!
कैसे? किसने देखा ?
सबने देखा 
पहले एक का सर ऊपर आया 
फिर छुप गया 
फिर दूसरे का 
और वो भी नीचे बैठ गया 
दो लोग!
कोई बोला "मुझे पता है दूसरा सर औरत का है
दोनों एक साथ ऊपर नहीं आते"
जैसे वो साथ दिखाई नहीं देना चाहते 
किसी को नहीं, कभी नहीं


सोमवार, 11 मार्च 2019

शायद... तुम्हें पता हो

हुई मुद्दत
कि वक़्त थम गया 
और छोड़ गया तुम्हारा अक्स
मेरे चेहरे के सामने 
मेरी बंद आँखों में...

इस अक्स के पीछे का चेहरा 
हँसता मुस्कराता बातें करता 
सीधे मेरी आँखों में देखता...
अब दिखाई नहीं देता 
वो आवाज़ अब सुनाई नहीं देती 
हाँ पर... 
अब भी कभी कभी 
मेरी हथेली पर पसीने की
एक हलकी सी पर्त का एहसास होता है
'दोस्त' वो पसीना आज भी 
दो हाथों का मालूम होता है 
शायद...
तुम्हें पता हो


बुधवार, 31 अक्तूबर 2018

ग़ज़ल और हार

सोचता हूँ चंद शेर कहूँ 
चंद... से मक़सद है कि
कम से कम इतने तो हो जाएं 
कि एक ग़ज़ल की माला अपने गले में पड़ जाये 
चलो ग़ज़लों की रवानगी न हो सके, न सही
एक नज़्म की नज़ाक़त ही हाथ लग जाये 

चलिए पहले मुद्दा तो ढूंढ लें 
जनाब शायद आप मतले की बात कर रहे हैं 
मुआफ करें क़िबला... आपने सही फ़रमाया 
मतला, मतला --
ख़ैर तो एक बार फिर 
काम आएगी ज़िन्दगी,
ज़िन्दगी जो मक़्ते तक पहुँच गयी है
कितना कुछ है इसके दामन में 
इश्क़, जुदाई, मिलन, खुशियां
हसरतें, लालच, चोटें, सुबकियां 
कुछ सख़्त हिदायतें, चंद ट्रॉफियां
और भी बहुत कुछ... 
अब कोशिश शुरू की जाये 
तो जनाब मुलाहज़ा हो जाए -- 

वो कल मिले और आज बिछड़ गए 
वो कल मिले और आज बिछड़ गए 

पर मैंने मुक़र्रर तो सुना ही नहीं 
जी शायद सुनाई नहीं दिया होगा  
यहाँ शोर भी बहुत है 
है ना 
ख़ैर ग़ौर फरमाएं 

वो कल मिले और आज बिछड़ गए  
इतनी जल्दी जनाब के तेवर बदल गए 

शुक्रिया शुक्रिया... आदाब

वो कल मिले और आज बिछड़ गए  
इतनी जल्दी जनाब के तेवर बदल गए 
अरमानों पर मेरे बादल घिर आये 
मुझसे क्या ग़लत हुआ कोई बतलाये 
ये बिला वजह था, यही कह जाये 
जो अब तक न हुआ वो हो जाये 
कोई नयी नवेली ही घट जाये 
पुराना सब कुछ दफ़्न हो जाये 
अच्छे वक़्त का बीज जम जाये 
और बुरे दिनों पर मिट्टी पड़ जाये --

जी अब ज़रा सोचने के लिए वक़्फ़ा --
म्यां ज़रा वो पानी का प्याला इधर सरकाना 
शायद इसीको पानी मांगना कहते होंगे 

ग़र कुछ देर और ये सिलसिले चल जाते  
'दोस्त' इनमें कुछ और शेर जुड़ जाते 
हमने ग़ज़लों के पैगम्बर का क्या बिगाड़ा था 
हार नहीं मांगीग़ज़ल का हार माँगा था। 

अगर आपको पसंद न आई तो क़ुसूर आपका नहीं है

मंगलवार, 25 जुलाई 2017

कुछ भी

फिर, फिर क्या हुआ
फिर? फिर क्या होना था
क्या होना था? अरे मगर हुआ क्या
तू भी यार, अरे वही जो होना था,
मतलब?
मतलब कुछ खास नहीं
हे भगवान!
क्यों इतनी भक्ति में डूब गया?
अबे भक्ति छोड तू अपने इस व्यक्तवय का मतलब ज़रा समझायेगा मुझे
व्यक्तवय ? अरे दो शब्द व्यक्तवय हो जाते हैं क्या?
अबे उल्लू के पट्ठे मैंने पूछा था की उस दिन क्या  हुआ था
ये लो। अब ये कौन से दिन की बात है?
एक मिनट, रुक ज़रा
ले रुक गया
तेरे घर में थोड़ी दारू है?
'दारू'? अबे पगला गया है? दोपहर के तीन बजे हैं। दारू!
इजाज़त हो तो आपकी तारीफ़ में कुछ कहना है
इरशाद, ज़रूर कहिये
ग़ौर फरमाएं, तेरे जैसे बन्दे से सर खपाना हो
तेरे जैसे बन्दे से ग़र सर खपाना हो
तो 'दोस्त' सुबह चार बजे भी पीनी पड़ सकती है... मुक़र्रर ? नहीं ?
अरे यार तू तो वाकई बड़ा परेशान लग रहा है आज 
नहीं नहीं परेशानी कैसी, मैं तो बस ऐसे ही 
आज कोई और मुद्दा नहीं है तेरे पास?
अच्छा सुन
चल सुना 
तूने किसी जासूसी दफ्तर में नौकरी कर ली है क्या 
क्यों, तुझे कैसे पता चला 
तू किसी बात का सीधा जवाब ही नहीं दे रहा 

कट, बस। बढ़िया हुआ। अगले हफ़्ते  दोनों टाइम पर आ जाना । 

बुधवार, 5 जुलाई 2017

ट्रेन कहानियां

ट्रेन बस छूटने ही वाली थी। रेलवे के कई कर्मचारी अपने अपने काम में जुटे थे। एक जत्था डिब्बों के नीचे कुछ ठोक बजा के देख रहा था, तो दूसरा ऊपर चढ़ कर नज़र मार रहा था। कुछ लोग प्लेटफार्म पर भी अलग-अलग किस्म का काम कर रहे थे। मसलन, लोगों के टिकट चेक किये जा रहे थे कुली अपने सर पर भारी सामान ढ़ो रहे थे। ट्रेन के अंदर भी रेल के कई लोग थे। कुछ सफाई देख रहे थे, कुछ यात्रियों को उनकी जगह दिखा रहे थे। बुज़ुर्गों का सामान सही जगह रख रहे थे। यात्रियों के भोजन और चाय पानी की सूची बन रही थी  जी आप शाकाहारी हैं? कटलेट और इडली है। नॉनवेज में ऑमलेट है…
इन सबके अलावा ट्रेन के आसपास, ट्रेन के अंदर और ट्रेन से बहुत दूर - और भी बहुत कुछ होता है। एक तो वो स्टेशन जहाँ से ट्रेन छूट रही है, दूसरा ट्रेन के अंदर और तीसरा वो स्टेशन जहाँ ट्रेन जा रही है। इन तीनों स्थानों में क्या-क्या घट रहा है, इसकी जानकारी सिर्फ एक ही इंसान को हो सकती है, वो है इसका लेखक - जो कि मैं हूँ।

एक

हर ट्रेन एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक यात्रियों को ले कर जाती है।  ट्रेनें चलती ही यात्रियों को एक से दूसरे स्थान ले जाने के लिए हैं। जिन्हें भी जहाँ जाना होता है वो उस स्थान का टिकट खरीदते हैं और टिकट में दिए नंबर वाली सीट पर बैठ जाते हैं। स्टेशन पर दो तरह की भीड़ होती है। एक तो वो जिन्होंने कहीं जाना होता है और दूसरे वो जो उन लोगों को छोड़ने आये हैं। जो लोग जा रहे हैं वो के ट्रेन के अंदर चले जाते हैं। बाकी बाहर रहते हैं।  ऐसे मौके ज़रा भावुक हो जाते हैं। गार्ड की सीटी और फहराती हुई हरी झंडी से परेशानी और बढ़ जाती है। लोगों की ऑंखें भीग जाती हैं।  कई तो खुल के रो लेते हैं। सफ़ेद रुमाल चेहरों का गीलापन सोखते नज़र आते हैं। जो यात्री हैं उनकी मानसिक स्थिति कुछ भिन्न होती है। वो इतने उदास नहीं दिखते। शायद उस यात्रा के रोमांचक कारणों से। शायद वो किसी खास व्यावसायिक काम से जा रहे हों। या फिर अपने किसी प्रिय से मिलने। या शायद छुट्टी के लिए ही सही... आख़िर ट्रेन चल पड़ती है। प्लेटफार्म वाले लोग धीरे धीरे पीछे जाने लगते हैं। क़द में छोटे होते जाते हैं। काफी देर तक सफ़ेद रुमाल दिखाई देते हैं। हिलते हुए हाथ दिखाई देते हैं। फिर सब ओझल... होने लगते हैं, प्लेटफार्म , फिर स्टेशन, फिर शहर...
ट्रेन और उन सब लोगों के बीच का अंतर बढ़ता ही जाता है। धीरे धीरे लोग इस हर क्षण बढ़ते हुए अन्तर के बारे में सोचना छोड़  देते हैं। 

दो

चलिए अब जो  लोग ट्रेन के अंदर बैठे हैं, उन पर नज़र डालते हैं। इन सब लोगों के बीच का अंतर बिलकुल नहीं बदलेगा। ये सब अपनी अपनी कुर्सी पर हैं इस वजह से किन्ही भी दो सीटों के बीच की दूरी बदली नहीं जा सकती। असल में इन सबके पास कोई चारा भी नहीं है, दूर या पास आने जाने का। इनके पास एक ही विकल्प है, बस बैठे रहो। किसी के पास ये शक्ति नहीं है कि वो किसी को या खुद को हटा सके।  अगर ये चाहें तो दुसरे यात्रियों को देखें, और चाहें तो उनसे दोस्ती भी कर लें। असल में कई लोग यही करते हैं। शुरुआत एक मुस्कान देने से हो सकती है, फिर कुछ खाना पीना, नाम पता और कभी कभी जोक्स भी। एक डिब्बे में बंधक जैसे बैठने से कई लोग ऊबने लगते हैं। अगर एक अपने पिछवाड़े को नीचे खिसकते हुए मुंह फाड़ेगा तो उसके सामने वाला भी, फिर कोई और, और फिर... ट्रेन की लगातार खटखट खटखट से बोरियत का एक जाल सा बिछ जाता है . चेहरे के सारे भाव मिट जाते हैं। आँखें अलसाने लगती हैं। इसके कुछ देर बाद उनके लिए ट्रेन, उसकी खटखट, बाहर के दृश्य, सबके अस्तित्व समाप्त हो जाते हैं। 

तीन

दूर कहीं एक ख़ाली प्लेटफार्म पर मंदिर के घंटे जैसी आवाज़ सुनाई दी है। टनटन टनटन टनटन। काले कोट वाला एक आदमी अपने कमरे से बाहर निकला, चारों तरफ नज़र घुमा कर फिर वापस चला गया। छोटी सी एक कैंटीन में खोमचे वाले अंगोछे से मक्खियों को हटाने लगे हैं। इन आदमियों को पूरा आराम मिल गया और मक्खियों को भर पेट भोजन। चाय को चौथी बार गरम करने के लिए चढ़ा दिया गया। कुछ नीली वर्दी वाले पटरियों पर उतर आए हैं और हथौड़े से किसी लोहे के हिस्से को ठोक रहे हैं। स्टेशन मास्टर को बाहर वाले सिग्नल से कड़कड़ करता संदेश आया है।  “ट्रेन पास हो रही है साहब इसका मतलब पांच मिनट में जाएगी। अरे भाई सुपर फ़ास्ट होती तो दो मिनट में निकल भी जाती। पर ये तो रुकने के लिए सिलो हो जाएगी ना। स्टेशन के बाहर कुछ कारें, टैक्सी, ऑटो और साइकिल रिक्शा वगैरा से लोग उतर रहे हैं।  ये लोग उन लोगों को लेने आये हैं जो ट्रेन से उतरेंगे। कई लोग तो पहले से ही प्लेटफार्म पर इंतज़ार कर रहे हैं। इनमे से एक अक्सर प्लेटफार्म किनारे से झुक कर देखता रहा है। अब तो सिग्नल हो गया है। ट्रेन भी दिखाई दे रही है। " गयी गयी, कुली, चलो भाई चलो " जैसे जैसे ट्रेन की दूरी कम हो रही थी, प्लेटफार्म पर लोगों की धड़कनें बढ़ रही थीं। एक युवती मेंहदी वाले हाथों में पूजा की थाली लिए है। उसमें रखा दिया किसीके झुर्रियों वाले हाथों ने जला दिया। वहां कुछ खादी के सफ़ेद कुर्ते भी हैं। उनके हाथों में फूलों के कई मोटे मोटे हार हैं। ट्रेन को देख कर बुज़ुर्ग पति पत्नी आगे बढ़ते हैं। खादी के धक्के से आदमी चौंक जाता है। ट्रेन एक लम्बी तीखी सी आवाज़ करते हुए धीरे धीरे रुक जाती है। फूलों के हार अब एक खादी की मोटी गर्दन में हैं। मिलिट्री की टोपी के आगे पूजा की थाली घूमती है। एक लड़की गले में स्टेथेस्कोप लिए बूढ़े माँ बाप के चरण स्पर्श करती है। गार्ड की सीटी सुनाई देती है। हरी झंडी लहराती है। यहाँ के सभी कलाकार अब प्लेटफार्म खाली कर रहे हैं।


ट्रेन एक बार फिर चल पड़ी है, एक और कहानी लिखने।


कहानी, एक पुरानी

 नमस्कार महोदय नमस्कार, जी आप... कौन? पहचाना नहीं मैंने।  जी मैं एक दूत हूँ। नदी के तट पर जो धर्मशाला है वहां से आया हूँ।  इतनी दूर से? जी क...